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न्यायिक प्राधिकारी से आप क्या समझते हैं? उन आधारों की विवेचना कीजिये जब न्यायिक प्राधिकारी पक्षकारों को माध्यस्थम के लिए निर्दिष्ट करता है।

Posted on November 25, 2025November 25, 2025 by KRANTI KISHORE

परिचय
न्यायिक प्राधिकारी (judicial authority) शब्द का उपयोग साधारणतः न्यायालयों, न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक संस्थानों के लिए किया जाता है जो कानूनी विवादों का निवारण, आदेश-निर्धारण तथा कर्तव्य निर्वहन करते हैं। न्यायिक प्राधिकारी केवल आदेश देने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे कानून के आधार पर तथ्यों का मूल्यांकन कर न्यायसंगत समाधान तक पहुँचाने का अधिकार और दायित्व रखते हैं। न्यायिक प्राधिकरण का उद्देश्य न केवल वाद का निर्णयन करना है, बल्कि प्रक्रिया न्याय (procedural fairness), निष्पक्षता और कानूनी उपचारों तक पहुँच सुनिश्चित करना भी है।

न्यायिक प्राधिकारी की परिभाषा व स्वभाव

अर्थ: वह न्यायालय या उसका कोई अधिकारी जो अधिकार क्षेत्र के भीतर विशेष कानूनी शक्तियाँ और कर्तव्य सम्पन्न हो और विवादों का निपटारा कर सके।

स्वभाव: निष्पक्षता (impartiality), स्वतंत्रता (independence), प्रक्रिया-न्याय, कानूनी रूप से बाध्यकारी आदेश जारी करने की क्षमता और कार्यवाही के दौरान प्रासंगिक साक्ष्यों व दलीलों का मूल्यांकन करना।

उदाहरण: सिविल और फौजदारी न्यायाधीश, एकल न्यायाधीश, पैनल, विशेष कोर्ट तथा मजिस्ट्रेट आदि।

माध्यस्थम (मध्यस्थता/मेडिएशन) का अर्थ और उद्देश्य
माध्यस्थम या मेडिएशन विवादों को वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) के माध्यम से, तृतीय पक्ष की सहायता से बिना औपचारिक निर्णय हेतु अदालत के बाहर सुलझाने की प्रक्रिया है। उद्देश्य: समय व संसाधन की बचत, संबंधों का संरक्षण, व्यक्तिगत नियंत्रण में समाधान तथा व्यवहारिक व सुविधाजनक परिणाम। न्यायालय अक्सर पक्षकारों को माध्यस्थम के लिए प्रेरित या निर्देशित कर सकता है ताकि न्यायिक संसाधन बेहतर उपयोग हों और शीघ्र निवारण सुनिश्चित हो।

न्यायिक प्राधिकारी किन आधारों पर पक्षकारों को माध्यस्थम के लिए निर्दिष्ट करता है — विवेचना

विधिक ढाँचा और नियम

कानून या अदालती निर्देश: कई न्यायालयों के पास ऐसे नियम हैं (उदा. सिविल प्रक्रिया संहिता, लोकल कोर्ट नियम, ADR पॉलिसी), जो निष्पक्ष प्रायोगिक निर्देश देने या पक्षकारों को मध्यस्थता/सुलह प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रेरित करने का अधिकार देते हैं।

न्यायिक दिशानिर्देश: सर्वोच्च या उच्च न्यायालयों के निर्देशों के आधार पर निचली अदालतें भी ADR अपनाने का निर्देश दे सकती हैं।

प्रकृति व प्रकर्षता का विचार

विवाद की प्रकृति: यदि मामला पारिवारिक, वाणिज्यिक, भूमि-संबन्धी, मजदूरी- विवाद या किसी ऐसे प्रकार का है जहाँ आपसी समझौता संभव व व्यवहारिक है, तो न्यायाधीश मध्यस्थता निर्देश दे सकते हैं।

तथ्यगत जटिलता व कानूनी मुद्दों की सीमा: जहाँ विवाद मुख्यतः तथ्यात्मक विवादों पर निर्भर करता है और कानून के स्पष्ट अनुप्रयोग की अपेक्षा नहीं, वहाँ मध्यस्थता उपयोगी रहती है। परंतु संवैधानिक प्रश्न, जटिल कानूनी निहितार्थ या सार्वजनिक हित के मुद्दे जिनका निपटारा केवल न्यायालय के अधिकार में हो — ऐसे मामलों में मध्यस्थता उपयुक्त नहीं मानी जा सकती।

समय, संसाधन और न्याय की कुशलता

निपटान में शीघ्रता: लंबित मामलों की संख्या घटाने और पक्षकारों को शीघ्र राहत देने हेतु मध्यस्थता कराई जा सकती है।

अदालत के संसाधनों का संरक्षण: साधारण तथा सुलह-योग्य मामलों में कोर्ट अपना समय जटिल संगीन मामलों पर खर्च कर सके इसके लिए मध्यस्थता निर्देश उपयुक्त होते हैं।

पक्षकारों की सहमति व स्वतंत्रता

स्वैच्छिक सहमति का महत्त्व: आदर्शतः मध्यस्थता स्वैच्छिक होनी चाहिए। न्यायिक प्राधिकारी पक्षकारों को मध्यस्थता हेतु निर्देश दे सकते हैं परंतु पक्षकारों की सहमति, उनकी स्थिति (उदा. शक्ति असंतुलन) और मध्यस्थता की शर्तों का मूल्यांकन आवश्यक है।

जब कोई पार्टी असहमत हो: कुछ अधिकारक्षेत्रों में न्यायाधीश पक्षकारों को अनिवार्य पूर्व-मध्यस्थता (pre-trial mediation/mandatory ADR) के लिए निर्देश दे सकते हैं; पर विवेक के तहत असहमत पक्ष के हितों व न्याय के अधिकार को ध्यान में रखना जरूरी है।

अधिकारों की रक्षा और सार्वजनिक नीति

संवैधानिक व सार्वजनिक हित: यदि मामला सार्वजनिक नीति, लोकहित याचिका, या संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है तो न्यायिक प्राधिकारी मध्यस्थता सौंपने से पहले यह सुनिश्चित करेंगे कि न तो जनता के हितों का हनन हो और न ही संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ें।

असमान शक्ति व धोखाधड़ी के मामलों में मध्यस्थता अनुचित हो सकती है क्योंकि समझौता विकृत या अनुपयुक्त हो सकता है। न्यायालय इस प्रकार के जोखिम का आकलन करेगा।

मध्यस्थ की योग्यता व प्रक्रिया की पारदर्शिता

उपयुक्त मध्यस्थ का चयन: न्यायिक प्राधिकारी ऐसे तृतीय पक्ष का सुझाव या निर्देश दे सकते हैं जिनकी योग्यता, निष्पक्षता और विशेषज्ञता उपयुक्त हो—विशेषकर तकनीकी/वाणिज्यिक मामलों में।

प्रक्रिया की शर्तें: मध्यस्थता गुप्त, स्वैच्छिक एवं संरचित होनी चाहिए; मध्यस्थता के परिणामों की कानूनी स्वीकार्यता तथा यदि समझौता विफल रहे तो आगे की न्यायिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव—इन पहलुओं के बारे में स्पष्ट निर्देश भी आवश्यक होते हैं।

पूर्ववर्ती निर्णय व न्यायिक विवेक (Judicial discretion)

पिछले निर्णयों का पालन: उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों व मिसालों के अनुसार न्यायिक प्राधिकारी अपने विवेक का प्रयोग करते हुए मध्यस्थता को निर्देशित करते हैं। अदालतें परिस्थिति अनुसार निर्देश देती हैं और कभी-कभी फेज़बाई (case-by-case) दृष्टिकोण अपनाती हैं।

संतुलन: न्यायिक प्राधिकारी को यह संतुलन करना होता है कि मध्यस्थता से क्या वाद का त्वरित निवारण होगा या क्या यह किसी पार्टी के न्यायिक अधिकारों से समझौता कर देगा।

निष्कर्ष
न्यायिक प्राधिकारी वह संस्थागत या व्यक्तिगत कानूनी प्राधिकारी है जो विवादों के निवारण हेतु विधिक अधिकारों के साथ निष्पक्ष निर्णय देने का दायित्व रखता है। जब वह पक्षकारों को माध्यस्थम के लिए निर्दिष्ट करता है, तो उसके द्वारा विचार किए जाने वाले आधारों में कानूनी ढाँचा, विवाद की प्रकृति व जटिलता, संसाधन व समय की आवश्यकताएँ, पक्षकारों की सहमति व शक्ति-संतुलन, सार्वजनिक नीति तथा मध्यस्थता की प्रक्रिया और मध्यस्थ की योग्यता शामिल होती है। न्यायिक प्राधिकारी का निर्णय परिस्थिति-निर्भर होता है और उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि मध्यस्थता से न्याय की उपलब्धि, अधिकारों की रक्षा और सार्वजनिक हितों का क्षरण न हो।

ADR, judicial authority, न्यायिक प्राधिकारी

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