स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक ‘आर्थिक विकास’ तथा ‘सामाजिक न्याय’ की स्थापना थी। देश को गरीबी के जाल से निकालने तथा सभी नागरिकों की भलाई के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य करना आवश्यक था। इस अध्याय में भारत द्वारा अपनाई गई विकास नीतियों, योजना आयोग की भूमिका, प्रमुख पंचवर्षीय योजनाओं और विकास से जुड़ी बहसों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
महत्वपूर्ण अध्ययन बिंदु (Detailed Study Notes for Govt. Exams)
1. विकास की अवधारणा और अंतर्विरोध
- विकास का अर्थ: स्वतंत्रता के समय पश्चिमी औद्योगिक देशों की भांति आधुनिकीकरण, आर्थिक संवृद्धि और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि को विकास माना जाता था।
- विकास बनाम विस्थापन (उड़ीसा का उदाहरण): उड़ीसा में प्रचुर लौह अयस्क भंडार के दोहन के लिए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय इस्पात उत्पादकों (जैसे पोस्को प्लांट) से समझौते किए। इससे पूंजी निवेश और रोजगार की उम्मीद थी, परंतु आदिवासी आबादी के विस्थापन और पर्यावरण प्रदूषण के कारण भारी विरोध हुआ।
- राजनीतिक निर्णय की अनिवार्यता: लोकतंत्र में विकास की प्राथमिकताओं का अंतिम निर्णय विशेषज्ञों के सुझाव के साथ-साथ जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ही लिया जाना चाहिए।
2. विकास के दो प्रमुख मॉडल
- उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल: यूरोप और अमेरिका द्वारा अपनाया गया, जिसमें मुक्त बाजार और निजी क्षेत्र की प्रमुखता होती है।
- समाजवादी मॉडल: सोवियत संघ द्वारा अपनाया गया, जिसमें उत्पादन के साधनों और अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण होता है।
- भारत के तत्कालीन नेता (जैसे जवाहरलाल नेहरू, सोशलिस्ट पार्टी व कम्युनिस्ट पार्टी) सोवियत संघ के नियोजन मॉडल से काफी प्रभावित थे।
3. नियोजन (Planning) और बॉम्बे प्लान (1944)
- 1944 में प्रमुख भारतीय उद्योगपतियों का एक समूह एकजुट हुआ और उन्होंने देश में सुनियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त मसौदा तैयार किया, जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है।
- उद्योगपतियों ने मांग की कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक निवेशों में अग्रणी भूमिका निभाए।
4. योजना आयोग एवं नीति आयोग
- योजना आयोग की स्थापना: मार्च 1950 में भारत सरकार के एक मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव द्वारा गैर-संवैधानिक व सलाहकारी निकाय के रूप में की गई। इसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे।
- संवैधानिक आधार: संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles) के कल्याणकारी उद्देश्यों को धरातल पर उतारना।
- नीति आयोग (NITI Aayog): योजना आयोग के स्थान पर 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की गई।
5. प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–1956)
- मुख्य उद्देश्य: देश को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालना और विभाजन से प्रभावित कृषि क्षेत्र को पुनर्स्थापित करना।
- प्रमुख अर्थशास्त्री: युवा अर्थशास्त्री के.एन. राज ने प्रारंभिक दो दशकों में विकास की गति धीमी और संतुलित रखने का सुझाव दिया।
- प्राथमिकता: कृषि, सिंचाई और बांध निर्माण (भाखड़ा नांगल परियोजना)।
- भूमि सुधार: भूमि के असमान वितरण को समाप्त कर भूमि सुधार को आर्थिक विकास का आधार माना गया।
6. द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–1961)
- वास्तुकार: प्रख्यात वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद् प्रो. पी.सी. महालनोबिस।
- प्राथमिकता: भारी उद्योगों का तीव्र विकास और संरचनात्मक परिवर्तन।
- संरक्षणवादी नीति: घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए भारी आयात शुल्क (Import Tariffs) लागू किए गए। सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी आदि का विस्तार किया गया।
- समस्याएं: बहुमूल्य विदेशी मुद्रा का क्षरण और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा के कारण खाद्यान्न संकट की आशंका उत्पन्न होना।
7. विकेंद्रीकृत नियोजन: केरल मॉडल
- केरल में विकास का मार्ग विशाल औद्योगिक परियोजनाओं के स्थान पर शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, प्रभावी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित रहा।
- उपलब्धियां: अपेक्षाकृत कम प्रति व्यक्ति आय के बावजूद शत-प्रतिशत साक्षरता, उच्च जीवन प्रत्याशा, तथा न्यूनतम शिशु व मातृ मृत्यु-दर।
- नव लोकतांत्रिक पहल (1987-1991): आम जनता, पंचायतों और स्वयंसेवी संगठनों को सीधे नियोजन प्रक्रिया में जोड़ना।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी (FAQ)
1. योजना आयोग की स्थापना कब और किस प्रकार की गई थी?
योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार के एक सामान्य मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव के माध्यम से की गई थी। यह एक गैर-संवैधानिक और सलाहकारी निकाय था।
2. ‘बॉम्बे प्लान’ क्या था और यह कब पेश किया गया?
1944 में भारत के प्रमुख उद्योगपतियों के एक समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने के लिए एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है। इसमें सरकार द्वारा भारी औद्योगिक निवेश की वकालत की गई थी।
3. प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य केंद्र-बिंदु क्या था?
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) में कृषि, भूमि सुधार, सिंचाई तथा भाखड़ा नांगल जैसी बड़ी बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाओं पर मुख्य जोर दिया गया था।
4. द्वितीय पंचवर्षीय योजना के मुख्य योजनाकार कौन थे?
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-1961) के मुख्य योजनाकार प्रख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद् प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस थे।
5. विकास के ‘केरल मॉडल’ की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
केरल मॉडल भारी उद्योगों के बजाय मानव विकास—शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, प्रभावी खाद्य-वितरण और गरीबी उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जाना जाता है।
6. राजनीति में ‘वामपंथ’ और ‘दक्षिणपंथ’ का क्या अभिप्राय है?
‘वामपंथ’ गरीबों के हितों और अर्थव्यवस्था पर राज्य के सख्त नियंत्रण का पक्षधर होता है, जबकि ‘दक्षिणपंथ’ खुली प्रतिस्पर्धा, निजी क्षेत्र और बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है।
7. योजना आयोग को समाप्त कर किस नई संस्था का गठन किया गया?
योजना आयोग के स्थान पर 1 जनवरी 2015 को ‘नीति आयोग’ (NITI Aayog – National Institution for Transforming India) की स्थापना की गई।
8. अर्थशास्त्री के.एन. राज ने प्रथम पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में क्या तर्क दिया था?
युवा अर्थशास्त्री के.एन. राज का मानना था कि भारत को शुरुआती दो दशकों तक विकास की रफ्तार धीमी रखनी चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
9. जे.सी. कुमारप्पा कौन थे और उनका क्या योगदान था?
जे.सी. कुमारप्पा एक प्रमुख गांधीवादी अर्थशास्त्री थे जिन्होंने ‘इकॉनोमी ऑफ परमानेंस’ पुस्तक लिखी और ग्रामीण व लघु उद्योगों के विकास पर बल दिया।
10. दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने क्या प्रमुख चुनौतियां आईं?
विदेशी प्रौद्योगिकी खरीदने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार की कमी हो गई और उद्योगों पर अत्यधिक ध्यान देने से कृषि क्षेत्र में खाद्यान्न संकट की स्थिति बनने लगी।
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