प्रस्तावना
प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) या अधिनियमन वह विधायी साधन है जिसके अंतर्गत संसद या राज्य विधानमंडल कुछ नियम, विनियम, आदेश, आदेशावली आदि बनाने का अधिकार किसी वैधानिक प्राधिकारी (सरकार, मंत्री, विभागीय अधिकारी, स्थानीय प्राधिकरण) को सौंप देता है। यह व्यवहार में शासन-प्रक्रिया को त्वरित, विशेषज्ञतापूर्ण और लचीलापन प्रदान करने का माध्यम है। परन्तु अतिशय प्रत्यायोजन से विधायी शक्ति का सुरक्षित और पारदर्शी व्यय सुनिश्चित करने के लिए संसदीय नियंत्रण आवश्यक है।
प्रत्यायोजित विधायन पर संसदीय नियंत्रण: आवश्यकताएँ
– लोकतांत्रिक जवाबदेही: जो विधि बनाने का अधिकार निर्वाचित सदनों ने किसी को सौंपा है, उसका प्रयोग भी निर्वाचित निकायों के नियंत्रण में होना चाहिए। इससे अभिकरणों के दुरुपयोग और मनमानी से बचाव होता है।
– विधि सिद्धांतों का पालन: नियमों का संवैधानिकता, प्राथमिक विधेयक (parent Act) के दायरे में रहकर बनना, और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
संसदीय नियंत्रण के साधन (भारत संदर्भ में)
(क) संवैधानिक और विधायी नियंत्रण
– मूल अधिनियम का स्पष्ट और सीमाबद्ध प्रावधान: प्रत्यायोजन का दायरा, उद्देश्य और सीमाएँ मूल अधिनियम में निर्धारित की जाती हैं।
– हुक्म-प्रतिबंध (Provisional limitations): कुछ मामलों में अधिनियम में ही स्पष्ट निर्देश/शर्तें रखी जाती हैं जिनके अंतर्गत नियम बनाए जा सकते हैं।
(ख) प्रक्रिया संबंधी नियंत्रण
– अधिसूचना और प्रकाशन की बाध्यता: नियम/नियमावलियों को लागू करने से पूर्व या बाद में आधिकारिक राजपत्र/अधिसूचना में प्रकाशित करना अनिवार्य होता है ताकि जनहित और पारदर्शिता बनी रहे।
– नियमों की पारित सरलीकरण/विशेष नियामक प्रक्रियाएँ: उदाहरणतः सार्वजनिक सुनवाई, परामर्श (consultation) आदि का प्रावधान।
(ग) संसदीय निगरानी उपाय
– निलंबन/रद्द करने का अधिकार (Negative and Affirmative Resolution procedures):
– Negative resolution: कई नियम संसद के समक्ष रखे जाते हैं और यदि किसी अवधि के भीतर संसद विरोध न करे तो वे नियम प्रभावी हो जाते हैं। यदि संसद असहमति जताए तो नियम रद्द किए जा सकते हैं।
– Affirmative resolution: कुछ संवेदनशील मामलों में नियमों को संसद की स्वीकृति अनिवार्य होती है — तभी नियम प्रभावी होंगे।
– नियंत्रक समितियाँ (Parliamentary Committees):
– संयुक्त संसदीय समिति, विधायी नियम समिति, या नियंत्रक समितियाँ नियमों की तकनीकी, विधिक और नीति-परक समीक्षा करती हैं और संसद को रिपोर्ट देती हैं।
– प्रश्न, मत-विचार-विमर्श और मंत्रियों से पूछताछ: सदन में प्रश्नकाल, चर्चा और विशेष प्रश्नों के माध्यम से सरकार से स्पष्टीकरण माँगा जा सकता है।
– रिपोर्टिंग दायित्व: सरकार को सदन/सदनों के समक्ष नियमों के क्रियान्वयन और प्रभावों की रिपोर्ट करनी होती है।
(घ) न्यायिक और प्रशासनिक नियंत्रण (संसदीय नहीं पर सहायक)
– उच्च न्यायालय/सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक समीक्षा: यदि नियम मूल अधिनियम के दायरे से बाहर जाएँ, अतिशय शक्तियाँ हों या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो न्यायपालिका द्वारा रद्द किए जा सकते हैं। यह संसदीय नियंत्रण का एक पूरक माध्यम है।
– नियंत्रक संस्थाएँ/लोक लेखापरीक्षण और लोकपाल आदि की रिपोर्टिंग—अपराध/दुरुपयोग हेतु जांच की जा सकती है।
नियंत्रण की वास्तविकता और सीमाएँ
– तकनीकी और व्यावहारिक कारणों से व्यापक प्रत्यायोजन आवश्यक: विस्तृत विधि-निर्माण के लिए संसदीय समय और विशेषज्ञता सीमित है; इसलिए सरकारों को विस्तृत अधिकार दिए जाते हैं—परन्तु यह नियंत्रण को कमजोर कर देता है।
– नकारात्मक अनुमोदन की सीमाएँ: Negative resolution प्रक्रिया अक्सर औपचारिक होती है—परिषद/संसद प्रतिदिन के कार्यभार और राजनीतिक विचार-धाराओं में उलझी होने के कारण अधिकांश नियमों पर प्रश्न उठाने में असमर्थ रहती है। परिणामतः असंख्य नियम प्रभावी हो जाते हैं बिना त्वरित संसदीय समालोचना के।
– समितियों की प्रभावशीलता सीमित: संसदीय समितियाँ मूल्यवान समीक्षाएँ देती हैं पर वे बाध्यकारी (binding) नहीं होतीं; सरकारों द्वारा सुझावों को अनदेखा किया जा सकता है। संसाधन और समय की कमी भी एक बाधा है।
– जानकारी और पारदर्शिता की कमी: कई बार नियमों के मसौदे सार्वजनिक नहीं किए जाते या अपर्याप्त परामर्श होता है, जिससे संसदीय और जन-निरीक्षण कठिन हो जाता है।
– प्राथमिक अधिनियम का अस्पष्ट/विस्तृत दायरा: अगर मूल अधिनियम अत्यधिक व्यापक भाषा में शक्तियाँ सौंपता है तो नियमों को चुनौती देना कठिन हो जाता है—क्योंकि न्यायपालिका भी वैधता पर सहनशील हो सकती है यदि नियम अधिनियम के अनुरूप प्रतीत हों।
– राजनीतिक वास्तविकताएँ: एक सरकार के नियंत्रण वाले सदन में उसके द्वारा बनाए गए नियमों की आलोचना सीमित हो सकती है—विशेषकर जहां एकपक्षीय बहुमत हो। इससे संसदीय विवेचना औपचारिक रह सकती है।
क्या संसदीय नियंत्रण पर्याप्त है?
– आंशिक रूप से पर्याप्त: मौजूदा उपकरण (नकारात्मक/सकारात्मक रिज़ॉल्यूशन, समितियाँ, प्रश्नकाल, प्रकाशन) सिद्धांततः पर्याप्त आयाम देते हैं पर व्यवहार में अक्सर अपर्याप्त साबित होते हैं। कारणों में संसदीय समय-सीमाएँ, राजनीतिक प्राथमिकताएँ, पारदर्शिता की कमी और व्यापक प्रत्यायोजन शामिल हैं।
– सुधार आवश्यक हैं: नियंत्रण की वास्तविक प्रभावशीलता बढ़ाने हेतु निम्न सुधार उपयोगी होंगे:
1. प्रत्यायोजन के लिए स्पष्ट और संकुचित मार्गदर्शक सिद्धांत (delegation guidelines) तथा अधिनियमों में निर्दिष्ट उद्देश्य और अवधि।
2. सभी अहम नियमों के प्रस्तावों (draft rules) का सार्वजनिक प्रकाशन और परामर्श अनिवार्य करना, जिससे विशेषज्ञ और आम जनता प्रतिक्रिया दे सकें।
3. Affirmative resolution के दायरे का विस्तार उन वर्गों पर जहाँ संवेदनशीलता/आर्थिक प्रभाव अधिक हो।
4. संसदीय समितियों को अनिवार्य समय-सीमा में रिपोर्ट पेश करने का अधिकार और सरकार पर पालन कराने की बाध्यकारी व्यवस्था।
5. नियमों पर समयबद्ध समीक्षा (sunset clauses) और उनके नवीनीकरण के लिए संसदीय अनुमोदन।
6. नियमों के प्रभावों का नियमित आडिट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग।
7. राज्य-लेवल पर भी समन्वित मानक और प्रशिक्षण, ताकि स्थानीय प्रत्यायोजित विधायन का दुरुपयोग कम हो।
निष्कर्ष
प्रत्यायोजित विधायन शासन-प्रक्रिया का आवश्यक उपकरण है जो त्वरित शासन, तकनीकी विशेषज्ञता और व्यवहारिक लचीलापन प्रदान करता है। परन्तु लोकतांत्रिक जवाबदेही बनाए रखने के लिए संसदीय नियंत्रण अत्यावश्यक है। वर्तमान में उपलब्ध संसदीय नियंत्रण के साधन सिद्धांतगत रूप से उचित हैं, किन्तु व्यावहारिक और संरचनात्मक सीमाओं के कारण वे अक्सर पर्याप्त नहीं होते। इसलिए पारदर्शिता, सीमाओं की स्पष्टता, समितियों की भूमिका को सशक्त बनाना, Affirmative procedures का अधिक उपयोग और नियमों पर समयबद्ध समीक्षा जैसे सुधार अनिवार्य हैं ताकि प्रत्यायोजित विधायन लोकतांत्रिक, संवैधानिक और जवाबदेह बने रहें।