किसी भी विधिक व्यवस्था में निष्पक्षता और धार्मिकता (impartiality and fairness) का सिद्धांत सर्वोपरि होता है। इस सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने मामलों में न्यायाधीश नहीं बन सकता (nemo judex in causa sua)। यह सिद्धांत न केवल न्यायिक प्रक्रिया की नैतिकता का आधार है बल्कि कानूनी नियमों और न्यायिक समीक्षा में भी इसकी व्यापक मान्यता है।
1. सिद्धांत का अर्थ और तात्पर्य
– “Nemo judex in causa sua” का शाब्दिक अर्थ है — “किसी का भी अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं होना चाहिए”।
– तात्पर्य: कोई भी ऐसा व्यक्ति जो किसी हित (direct or indirect) से जुड़ा हुआ हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया में न हो। इसका उद्देश्य न्याय की निष्पक्षता और देखने योग्य निष्पक्षता (appearance of impartiality) बनाये रखना है।
– यह सिद्धांत दो प्रमुख घटकों में दिखता है:
– वाज़्य निष्पक्षता (actual impartiality) — निर्णय करने वाला वास्तविक रूप से पक्षपात से मुक्त हो।
– दर्शनीय निष्पक्षता (apprehension/appearance of impartiality) — बाहरी निरीक्षक को ऐसा आभास न हो कि निर्णय पक्षपात पूर्ण है।
2. स्रोत और न्यायिक मान्यता
– सामान्य कानून (common law) में यह सिद्धांत प्राचीन है और अनेक सार्वजनिक तथा निजि मामलों में अपनाया गया है।
– अंतरराष्ट्रीय और भारतीय न्यायव्यवस्था में भी इसकी स्वीकार्यता है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में इस सिद्धांत को अपनाया और स्पष्ट किया है कि केवल वास्तविक पक्षपात ही नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ जिनसे निष्पक्षता का शक उत्पन्न हो, भी अस्वीकार्य हैं।
– व्यवहार में यह सिद्धांत संवैधानिक दृष्टि से भी जुड़ा हो सकता है—क्योंकि न्याय पाने का हक (right to a fair trial) संवैधानिक धारणाओं से जुड़ा है।
3. अनुकरणीय प्रावधान और प्रतिबंध
– न्यायाधीश या नियुक्त अधिकारी को सम्बंधित हितों का खुलासा करना चाहिए। यदि हित प्रत्यक्ष है, तो हट जाना (recusal) अपेक्षित है।
– प्रशासकीय फैसलों में भी अधिकारी को ऐसे मामलों से अलग होना चाहिए जिनमें उसका निजी हित संलग्न हो।
– कंपनी कानून, कर कानून, भूमि विवाद आदि विभिन्न क्षेत्रों में उपर्युक्त सिद्धांत लागू होता है ताकि निर्णय निष्पक्ष रहे।
4. अपवाद और सीमाएँ
– पूर्णतः शुद्ध लागू करवाने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं — कभी-कभी छोटे-मोटे संबंधों को पक्षपात मानना जरूरी नहीं होता। इसलिए न्यायालयों ने कुछ परिस्थितियों में निर्बाध अपवाद स्वीकार किए हैं।
– अपवाद तब मान्य हो सकते हैं जब:
– हित बहुत सामान्य या अनुगामी हो और निर्णय पर प्रभाव का वास्तविक जोखिम नगण्य हो।
– कोई वैधानिक प्रावधान विशेष रूप से किसी अधिकारी को निर्णय लेने देता हो और अन्य सम्यक व्यवस्था उपलब्ध न हो।
– तथापि, इन अपवादों को बहुत संकुचित रूप में ही स्वीकार किया जाता है; मूल सिद्धांत ही प्रधान रहता है।
5. उदाहरणात्मक निर्णय (Select Judicial Examples)
– कई मामलों में उच्च न्यायालयों/सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे अधिकारियों के निर्णय खारिज किए जिनके पास आर्थिक, पारिवारिक या निजी संबंध होने के कारण पक्षपात का स्पष्ट शक था।
“Nemo judex in causa sua” — किसी भी व्यक्ति को अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं होना चाहिए। यह सिद्धांत न्यायिक निष्पक्षता व न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है। इसमें वास्तविक और दृश्यात्मक निष्पक्षता दोनों शामिल हैं। भारतीय न्यायालयों ने यह बताया है कि केवल वास्तविक पक्षपात ही नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ जिनसे निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो, भी निर्णय के लिए असंगत हैं। इसलिए यदि न्यायाधीश/अधिकारी का कोई निजी हित संबंधित मामले में है तो उसे हट जाना चाहिए; अपवाद केवल संकुचित परिस्थितियों में सीमित रूप से मान्य हैं। इस प्रकार यह सिद्धांत न्यायपालिका और प्रशासन की निष्पक्षता बनाए रखने हेतु आवश्यक है।