परिचय
ट्रिब्यूनल (Tribunal) शब्द का प्रयोग विशेषीकृत quasi-judicial संस्थाओं के सन्दर्भ में होता है जो विशिष्ट विषयों, विवादों या प्रशासकीय क्षेत्रों में निर्णय देने के लिए बनाए जाते हैं। सामान्य न्यायालयों की तरह ट्रिब्यूनल भी विवादों का निपटारा करते हैं, किंतु उनका स्वरूप, कार्यक्षेत्र तथा प्रक्रिया विशिष्ट, सरल और शीघ्र होती है। भारत में संवैधानिक प्रावधानों, विशेष कानूनों और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुरूप अनेक प्रकार के ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं—जैसे कर, श्रम, परिवहन, तकनीकी, पर्यावरण आदि से संबंधित ट्रिब्यूनल।
ट्रिब्यूनल की परिभाषा तथा स्वरूप
ट्रिब्यूनल किसी विशेष प्रकार के विवादों पर सुनवाई करने के लिए गठित निकाय है जो न्यायिक तथा प्रशासनिक दोनों तत्वों का मिश्रण हो सकता है। इसे quasi-judicial body भी कहा जाता है क्योंकि उसके निर्णयों में न्यायालयीन अधिकारों जैसा प्रभाव होता है परन्तु वह पूर्णतया सामान्य न्यायपालिका नहीं होती। ट्रिब्यूनल का स्वरूप सामान्यतः:
– विशिष्ट क्षेत्रीय या पदानुक्रमिक अधिकार (jurisdiction) पर सीमित होता है;
– उसमें विशेषज्ञ सदस्य अथवा तकनीकी ज्ञान वाले अधिकारी होते हैं;
– प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल, सुव्यवस्थित और कम औपचारिक होती है;
– निर्णयों के विरुद्ध अपीली व्यवस्था या judicial review का विकल्प सीमित रूप से उपलब्ध रहता है।
ट्रिब्यूनल की प्रकृति (Nature) — कानूनी तथा संवैधानिक दृष्टि
1. Quasi-judicial प्रकृति: ट्रिब्यूनल न केवल तथ्यात्मक परीक्षण करते हैं, बल्कि वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या कर के बाध्यकारी निर्णय देते हैं। अतः उनके निर्णयों का प्रभाव न्यायिक निर्णयों जैसा माना जाता है।
2. विशेषज्ञता और तकनीकी प्रकृति: ट्रिब्यूनल प्रायः किसी विशेष विषय में विशेषज्ञता रखते हैं—जैसे टेक्निकल, आर्थिक या प्रबंधकीय ज्ञान—इससे विवादों का त्वरित और योग्य निपटारा होता है।
3. प्रशासनिक-कम-न्यायिक मिश्रण: कई ट्रिब्यूनलों को प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है; इसलिए वे नीति और कार्यवाही दोनों पर असर डालते हैं।
4. संवैधानिक प्रतिक्रिया: भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में ट्रिब्यूनलों की स्थापना और कार्य विधि संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर ट्रिब्यूनलों की प्रकृति और उनकी समीक्षा के सिद्धांत घोषित किए हैं (जैसे A.K. Krishnan, L. Chandra Kumar के प्रकरणों में)।
ट्रिब्यूनल के कार्य (Functions)
ट्रिब्यूनलों के प्रमुख कार्य निम्न प्रकार से संक्षेपित किए जा सकते हैं:
1. विवादों का निपटारा: ट्रिब्यूनल मुख्यतः उनके अधिकारक्षेत्र के भीतर आने वाले मामलों का सुनवाई तथा निर्णय करता है—उदा. कर विवाद, श्रम विवाद, सीमा शुल्क आदि।
2. त्वरित और सरल न्याय: प्रक्रिया को सरल कर शीघ्र निपटारा सुनिश्चित करना, जिससे न्याय तक पहुँच सुगम हो।
3. विशेषज्ञ परामर्श और निर्णय: तकनीकी मुद्दों पर विशेषज्ञता के आधार पर निर्णय देना।
4. प्रशासनिक नियंत्रण/निगरानी: कुछ ट्रिब्यूनल प्रशासनिक विभागों के निर्णयों की समीक्षा कर सक्षम नियंत्रण का काम करते हैं।
5. नीतिगत सुधारों हेतु सिफारिशें: कुछ ट्रिब्यूनल नीति-निर्माताओं को व्यवहारिक सुझाव भी देते हैं क्योंकि वे क्षेत्रीय और तकनीकी मामलों में अनुभव रखते हैं।
ट्रिब्यूनल द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया (Procedure) — विशेषताएँ और उदाहरण
ट्रिब्यूनल प्रक्रिया सामान्य न्यायालयीय प्रक्रिया से कुछ हद तक भिन्न और सरल होती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:
1. लघु और अनौपचारिक कार्यवाही: प्रमाण-प्रस्तुति और बहस में कम औपचारिकता रहती है। नियम तथ्य और तर्क पर केन्द्रित होते हैं बजाय कठोर प्रक्रियात्मक नियमों के।
2. साक्ष्य-संग्रह और विशेषज्ञ साक्ष्य: तकनीकी मामलों में विशेषज्ञ साक्ष्य व रिपोर्ट का विशेष महत्व होता है; परम्परागत साक्ष्य नियमों में लचीलापन रहता है।
3. सुनवाई में त्वरितता: मामलों का शीघ्र निपटारा करने के लिए सुनवाई शेड्यूल और समय-सीमा निर्धारित की जाती है।
4. अपील और पुनरावलोकन व्यवस्थाएँ: अधिकांश ट्रिब्यूनलों के निर्णयों के विरुद्ध उच्च स्तर पर अपील अथवा पुनरावलोकन का प्रावधान होता है, परन्तु यह सीमित आधारों पर संभव होता है (जैसे कानून के प्रश्न या प्रक्रिया-विचलन)।
5. रेकॉर्ड-कीपिंग और प्रकाशित निर्णय: कुछ ट्रिब्यूनल अपने निर्णयों को प्रकाशित करते हैं जिससे प्रेसीडेंट तथा मार्गदर्शन मिलता है, परन्तु सभी इसका पालन नहीं करते।
6. न्यायपालिका की समीक्षा (Judicial review): ट्रिब्यूनल के आदेशों पर उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ज्यूडिशियल रिव्यू कर सकते हैं यदि अधिकार का दुरुपयोग, अवैधता या संवैधानिक प्रश्न हों।
उदाहरण से व्याख्या
– श्रम ट्रिब्यूनल: औद्योगिक विवादों में नियोक्ता व कर्मचारियों के विवाद, वेतन, सेवा शर्तें आदि पर तकनीकी सुनवाई करता है; प्रक्रिया में त्वरित सुनवाई, मध्यस्थता व विशेषज्ञ प्रमाण प्रमुख रहते हैं।
– कर ट्रिब्यूनल (ITAT/Customs): कर मामलों में तकनीकी-आधारित विवादों का निपटारा; साक्ष्य में लेखांकन, आकलन विधि आदि की विशेषज्ञ जाँच होती है।
– प्रशासनिक ट्रिब्यूनल: सरकारी सेवकों के सेवा-सम्बन्धी विवादों का निपटारा; यहाँ नियम और प्रशासनिक प्रथाओं की समीक्षा होती है।
ट्रिब्यूनल और सामान्य न्यायपालिका के बीच साम्य व अंतर
साम्य: दोनों ही विवाद निपटाते हैं, निर्णय देने का अधिकार रखते हैं और न्याय से सम्बन्धित कार्य करते हैं। दोनों के आदेशों पर समझौता, अपील तथा न्यायिक समीक्षा संभव है।
अंतर: ट्रिब्यूनल की विशेषज्ञता, कम औपचारिक प्रक्रिया, त्वरित सुनवाई और सीमित अधिकारक्षेत्र मुख्य भिन्नताएँ हैं। न्यायालय पर जा सकने वाली अपील व judicial review सीमित व विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
न्यायालयों द्वारा ट्रिब्यूनलों पर आयी प्रमुख पंक्तियाँ (न्यायिक दृष्टि)
भारतीय सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों ने अनेक मामलों में कहा है कि ट्रिब्यूनल लोकतांत्रिक और प्रशासनिक दक्षता के लिये आवश्यक हैं पर उनकी संरचना, निदेश-प्रक्रिया और न्यायिक संरक्षण संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप होनी चाहिए। यदि ट्रिब्यूनल के निर्णयों से न्याय का उल्लंघन होता है या संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं। (उदाहरणार्थ L. Chandra Kumar v. Union of India में ट्रिब्यूनल के निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा की वैधता पर विचार हुआ)।
निष्कर्ष
ट्रिब्यूनल विशेषीकृत, त्वरित और अपेक्षाकृत सरल न्यायिक संस्थाएँ हैं जो न्याय की पहुँच, विशेषज्ञ समाधान और प्रशासनिक दक्षता प्रदान करती हैं। परन्तु उनकी वैधता, संरचना और प्रक्रियात्मक पारदर्शिता संवैधानिक मानदण्डों के अनुरूप होना आवश्यक है।