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उपप्रत्यायोजन से आप क्या समझते हैं? उप प्रत्यायोजन की अवधारणा को प्रशासनिक विधि में क्यों समाहित किया गया?

Posted on November 22, 2025November 22, 2025 by KRANTI KISHORE

सामान्य शब्दों में जब कोई व्यक्ति अपनी शक्ति को किसी अन्य व्यक्ति को प्रत्यायोजित करता है और वह अन्य व्यक्ति इस शक्ति को पुनः प्रत्यायोजन किसी अन्य व्यक्ति को करता है तो ऐसा पुनः प्रयोजन या उपप्रत्यायोजन कहलाता है। 

उदाहरण यदि संसद को किसी विषय पर विधि बनाने की शक्ति है और वह अपनी शक्ति का प्रत्यायोजन राज्य विधायिका को कर देती है और राज्य विधायिका इसका पुनः प्रयोजन  कुछ अधिकारियों या संस्थाओं को कर देती है तो यहां पुनः प्रत्यायोजन उपप्रत्यायोजन है।

  उपप्रत्यायोजन (Sub-delegation) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पहले से किए गए प्राधिकरण (delegation) को पुनः किसी तीसरे पक्ष को सौंपा जाता है। सरल शब्दों में, जब किसी अधिकारी या प्राधिकरण (A) को किसी कार्य का अधिकार देते हैं और वह अधिकारी उस अधिकार का उपयोग स्वयं नहीं करता बल्कि उस अधिकार को किसी अन्य अधिकारी (B) को सौंप देता है, तो इसे उपप्रत्यायोजन कहते हैं। प्रशासनिक विधि एवं संविधिक सिद्धांतों के संदर्भ में यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शक्ति के वितरण, जवाबदेही और वैधता के सिद्धांतों से जुड़ा होता है।

1. परिभाषा एवं स्वरूप

– परिभाषा: उपप्रत्यायोजन वह घटना है जिसमें अधिकार प्राप्तकर्ता द्वारा प्राप्त किए गए अधिकार को किसी अन्य को प्रदान किया जाता है।  

– स्वरूप: पूर्ण या आंशिक उपप्रत्यायोजन हो सकती है—कभी-कभी समूचे अधिकार को सौंप दिया जाता है, तो कभी कुछ सीमा तक। उपप्रत्यायोजन लिखित, मौखिक या व्यवहार के माध्यम से भी हो सकती है (हालाँकि लिखित रूप अधिक प्रमाण्य माना जाता है)।

2. उपप्रत्यायोजन का वैधानिक और सिद्धान्तगत आधार

– प्राधिकरण का नैतिक और संवैधानिक आधार: प्रशासकीय प्राधिकरण मूलतः विधानमंडल द्वारा स्थापित होता है और उसे आयोजित कर के विधि बनायी जाती है। प्राधिकरण के हस्तांतरण पर नियंत्रण इसलिए आवश्यक है ताकि शक्ति का दुरुपयोग न हो और उत्तरदायित्व नष्ट न हो।  

– आमतौर पर नियम: जहाँ कोई विधान या प्राधिकृत निर्देश स्पष्ट रूप से उपप्रत्यायोजन को मना करता है, वहाँ उपप्रत्यायोजन अवैध होगा। न्यायिक दृष्टि से भी यह देखा जाता है कि क्या मूल शक्ति के स्वभाव में ऐसा हस्तांतरण अनुमेय था।

3. उपप्रत्यायोजन के वैध और अवैध पहलू — न्यायालयों के दृष्टांत

– वैध उपप्रत्यायोजन: तब सम्भव है जब मूल अधिकारी के पास वैधानिक अधिकार हो और जिसने अधिकार दिया हो उसने उपप्रत्यायोजन की अनुमति दी हो; अथवा जब उस अधिकार का स्वभाव ऐसे हस्तांतरण की अनुमति देता हो; और जब उपप्रत्यागत व्यक्ति को आवश्यक योग्यता और निर्देश दिए गए हों।  

– अवैध उपप्रत्यायोजन: यदि कानून ने विशेष रूप से निर्देश दिया हो कि वह अधिकारी स्वयं ही निर्णय लेगा, अथवा यदि उपप्रत्यायोजन से उत्तरदायित्व अस्पष्ट हो जाए या निर्णय का स्वभाव बदल जाए, तो अदालत इसे अवैध ठहरा सकती है। भारत में अनेक मामलों में न्यायालय ने कहा है कि जब किसी संविधिक या वैधानिक प्राधिकारी के पास व्यापक निर्णायक सत्ता है और वह सत्ता किसी निहित हित या व्यक्तिगत विवेक से हटकर सौंप दी जाती है, तो यह अवैध माना जा सकता है।  

– प्रमुख न्यायाधिकरणी सिद्धांत: “Delegatus non potest delegare” — अर्थात् जिसे अधिकार सौंपा गया है वह स्वयं उसे पुनः सौंप नहीं सकता, जब तक कि उसे पुनः सौंपने की अनुमति न दी गई हो।

4. प्रशासनिक विधि में उपप्रत्यायोजन की अवधारणा को शामिल करने के कारण

– जवाबदेही (Accountability) सुनिश्चित करना: किसी निर्णय या कार्रवाई की वैधता व कारण पूछने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति ज्ञात होना चाहिए। उपप्रत्यायोजन की असीमित स्वतंत्रता से जवाबदेही धुँधली हो सकती है। इसलिए नियमों द्वारा नियंत्रण आवश्यक है।  

– संवैधानिक और कानूनी सीमाएँ बनाए रखना: विधानमंडल ने जो शक्तियाँ और सीमाएँ निर्धारित की हैं, उन्हें अधिनस्थ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अनियंत्रित रूप से बदलना दुरुपयोग का कारण बन सकता है। उपप्रत्यायोजन पर प्रतिबन्ध या दिशा निर्देश इन सीमाओं की रक्षा करते हैं।  

– पारदर्शिता और निष्पक्षता: उपप्रत्यायोजन अनियमित प्रक्रियाओं और पक्षपात के जोखिम को बढ़ा सकता है। नियंत्रण के माध्यम से प्रक्रियात्मक निष्पक्षता बनाये रखी जाती है।  

– दक्षता बनाम नियमन का संतुलन: कभी-कभी व्यावहारिकता की दृष्टि से निचले अधिकारियों को निर्णय लेने का अधिकार देना आवश्यक होता है। इसलिए प्रशासनिक विधि उपप्रत्यायोजन को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करती, बल्कि उसे नियंत्रित और सीमित करती है ताकि दक्षता के साथ-साथ नियमन और अधिकारिक नियंत्रण भी बना रहे।  

– न्यायिक नियंत्रण: प्रशासनिक विधि उपप्रत्यायोजन को इस लिये समाहित करती है ताकि न्यायालय अवैध उपप्रत्यायोजन की समीक्षा कर सके और नागरिक अधिकारों की रक्षा कर सके।

    उपप्रत्यायोजन वह प्रक्रिया है जिसमें प्राधिकृत अधिकारी द्वारा प्राप्त अधिकारियों/कर्तव्यों को किसी अन्य को पुनः सौंप दिया जाता है। सामान्य सिद्धांत है “delegatus non potest delegare”, अर्थात् जिसे अधिकार दिया गया है वह उसे स्वयं पुनः सौंप नहीं सकता, सिवाय तब जब विधि या प्राधिकारी स्पष्ट रूप से अनुमति देते हों। प्रशासनिक विधि में उपप्रत्यायोजन की अवधारणा इसलिए समाहित की गई है ताकि प्रशासनिक निर्णयों में जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक सीमाएँ बनी रहें; दूसरी ओर व्यावहारिकता और दक्षता हेतु कुछ सीमित उपप्रत्यायोजन की अनुमति देना भी आवश्यक है। अतः उपप्रत्यायोजन को पूरी तरह निषेध करने के बजाय कानूनी नियमों व दिशानिर्देशों के अंतर्गत नियंत्रित किया जाता है ताकि शक्ति का दुरुपयोग न हो और नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

    Administrative Law, Delegated Legislation, Subordinate Legislation, प्रशासनिक विधि

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