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नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? 

Posted on November 22, 2025November 22, 2025 by KRANTI KISHORE

परिचय

नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) कानून का वह मौलिक सिद्धांत है जो वैधानिक या प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता, उपयुक्त सुनवाई और तर्कसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित करता है। यह सिद्धांत भारतीय विधि व्यवस्था में भी गहराई से समाहित है और संवैधानिक संरक्षण के साथ न्यायिक समीक्षा के आवश्यक मानदंड प्रदान करता है। 

परिभाषा और महत्व

– परिभाषा: नैसर्गिक न्याय वे अनलिखित सिद्धांत हैं जिनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को कानून द्वारा दी गई प्रक्रियात्मक संविदानुसार निष्पक्ष सुनवाई व निर्णय देना है। इसे “procedural fairness” या “due process” का हिस्सा माना जाता है।

– महत्व: यह विधि के शासन (Rule of Law) का आधार है। निर्णय लेने वाली निकायों को अपने निर्णयों में पक्षपात और मनमानी से बचाने में मदद करता है तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

प्रमुख सिद्धांत

नैसर्गिक न्याय के दो मूलभूत सिद्धांत व्यापक रूप से प्रचलित हैं:

1. Audi alteram partem (दोनों पक्षों को सुनो)

   – इसका अर्थ है कि किसी के विरुद्ध निर्णय लेने से पहले उसे सुनना चाहिए। चेतावनी देने का अधिकार, पर्याप्त सूचना, साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर, वक़ील से साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर आदि इस सिद्धांत के भाग हैं।

   – उदाहरण: नौकरी से निलंबन या प्रतिबन्ध से पहले संबंधित कर्मचारी को आरोपों की सूचना देना और बचाव प्रस्तुत करने का अवसर देना।

2. Nemo judex in causa sua (कोई अपने कारण में न्यायाधीश नहीं हो सकता)

   – इसका अर्थ है कि निर्णयकर्ता को निष्पक्ष और बेदखल होना चाहिए; स्वार्थ-संबंधित नहीं होना चाहिए। निर्णय में किसी तरह का पूर्वाग्रह, हित-हितैषिता या हित-समूह की मौजूदगी स्वीकार्य नहीं है।

   – उदाहरण: यदि कोई अधिकारी किसी मामले में प्रत्यक्ष लाभार्थी है तो उससे उस मामले का निपटारा करवाना अनुचित होगा।

न्यायिक विकास और विस्तार

– भारतीय न्यायपालिका ने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को संवैधानिक दायरे तक विस्तारित किया है। सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों ने कहा है कि प्रशासनिक कार्यों में अनुचित व्यावहारिकता और मनमानी का निवारण करने के लिए ये सिद्धांत लागू होते हैं।

– मसलन: Maneka Gandhi v. Union of India (1978) मामले में ‘प्रक्रियात्मक निष्पक्षता’ और ‘न्यायिक जांच’ पर जोर दिया गया। इसी तरह A.K. Kraipak, Sukhdev Singh जैसे मामलों ने प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता की आवश्यकताओं को मजबूत किया।

प्रयोगिक उदाहरण 

– सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी: अधिकारिक नोटिस, आरोपों की सूचना, बहस का अवसर, साक्ष्य की जांच और निर्णय का तर्क प्रदान करना आवश्यक।

– अनुशासनात्मक कार्यवाही: पैनल/ट्रिब्यूनल का निष्पक्ष गठन; निर्णय में संबंधित अधिकारी की भागीदारी से बचना।

– लाइसेंस या अनुमति रद्द करना: निर्णय से पहले सुचना-पत्र और जवाब देने का अवसर।

अपवाद और सीमाएँ

– कुछ मामलों में सार्वजनिकीकरण, आपातकालीन स्थितियाँ या गोपनीयता के कारण पूर्ण नैसर्गिक न्याय लागू नहीं हो सकता। परंतु इन अपवादों को सीमित और औचित्यपूर्ण होना चाहिए।

– सुरक्षा, गुप्त सूचनाएँ, या सार्वजनिक हित में ऐसे कदम जरूरी होने पर प्रशासक को कुछ छूट मिल सकती है, पर न्यायालय इन्हें कसोटी पर परखते हैं ताकि मनमानी न हो।
 अतः कहा जा सकता है कि नैसर्गिक न्याय कानून के आधारभूत सिद्धांतों में से एक है जो निर्णय लेने की प्रक्रिया को न्यायसंगत, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाता है।

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