Skip to content

PADHO JANO

One Step Towards Education

Menu
  • HOME
  • India
    • Uttar Pradesh
      • Raebareli
      • Unnao
  • LAW (कानून)
    • Administrative Law (प्रशासनिक विधि)
    • Alternative Dispute Resolution (वैकल्पिक विवाद समाधान) ADR
    • Land Law (भूमि विधि)
  • PSYCHOLOGY
  • Constitution
    • प्रस्तावना
  • General Knowledge
    • Environment
  • English
    • Dictionary
      • अनाज और उनसे बने उत्पाद
  • SERVICES
  • DOWNLOADS
Menu

असंक्रमनीय भूमिधर क्या है?

Posted on November 27, 2025November 27, 2025 by ANSHIKA

परिचय
असंक्रमनीय भूमिधर (Inalienable Landholding) वह संपत्ति है जिसे स्वामी उसे बेचने, गिफ्ट करने, बंधक रखने या otherwise उसके स्वामित्व का स्वतंत्र रूप से स्थानांतरण करने के लिए वैधानिक रूप से सक्षम नहीं होता। यह अवधारणा भारतीय भूमि-सम्बंधी कानूनों, पारंपरिक क़ानून और राज्य-विशेष नीतियों में प्रयुक्त होती है।

परिभाषा और स्वरूप

  • असंक्रमनीय भूमिधर: ऐसी भूमि या भूमिधारक हक जिसमें संचरण के अधिकार सीमित या प्रतिबंधित हों। इसे केवल कुछ परिस्थितियों में वंशानुक्रम या निश्चित व्यक्तियों/संस्थाओं तक सीमित रखा जाता है।
  • स्वरूप: स्थायी उपयोगाधिकार, पुरुषार्थ-रहित स्वामित्व, या राज्य/सामुदायिक नियंत्रण के रूप में हो सकता है।

कानूनी आधार और उदाहरण

  • भारतीय कानूनी व्यवस्था में कुछ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से भूमि पर असंक्रमनीय अधिकार मान्य हैं—जैसे मठ-खेत, आदिवासी क्षेत्र, या कुछ धार्मिक/पारंपरिक भूमिधर।
  • राज्य विशेष कानून: कुछ राज्यों में अनुसूचित/जनजातीय इलाकों में भूमि का विक्रय या हस्तांतरण पाबंद होता है (जैसे राज्य के भूमि संरक्षण कानून)।
  • संविधानिक पहलू: अनुच्छेद 19(1)(f) और संपत्ति से संबंधित अन्य प्रावधान (हालाँकि 44वाँ संशोधन और भूमि-सुधार से संबंधित मुद्दे जटिल हैं)। आदिवासी क्षेत्रों के संदर्भ में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए 5वीं अनुसूची/6वीं अनुसूची का महत्व है।

वैधानिक प्रभाव और परिणाम

  • संपत्ति का बाजार मूल्य सीमित होता है क्योंकि स्वतंत्र विक्रय की छुट नहीं होती।
  • ऋणग्रस्तता सीमित: भूमि को बंधक के रूप में रखना कठिन या निषिद्ध हो सकता है।
  • उत्तराधिकार प्रतिबंध: केवल पारंपरिक या कानूनी उत्तराधिकारियों को ही स्वामित्व मिल सकता है।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: राज्य/समुदाय का निरंतर नियंत्रण बना रहता है, जिससे सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है (जैसे आदिवासी संरक्षण, सामुदायिक उपयोग)।

संक्षेप
असंक्रमनीय भूमिधर वह भूमि है जिसका स्वामित्व स्वतंत्र रूप से हस्तांतरित नहीं किया जा सकता अर्थात् उसे बेचने, गिफ्ट करने या बंधक रखने पर कानूनी पाबंदी होती है। यह प्रथा सामाजिक, सांस्कृतिक तथा संवैधानिक कारणों से स्थापित होती है और भारतीय संदर्भ में आदिवासी/अनुसूचित क्षेत्रीय कानूनों तथा कुछ राज्य-स्तरीय भूमि संरक्षण नियमों के माध्यम से लागू होती है। परिणामस्वरूप ऐसी भूमि का बाजार मूल्य सीमित रहता है, उसे बंधक बनाना कठिन होता है और उत्तराधिकार पारंपरिक रूप से नियंत्रित रहता है। न्यायिक वाधिकारों और राज्य नीतियों के परिप्रेक्ष्य में इस अवधारणा का उद्देश्य समुदायिक हित व संसाधन संरक्षण सुनिश्चित करना है।

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Useful Pages

  • Motivation
    • Quotes
    • Stories

Recent Posts

  • भारतीय उच्च न्यायालयों की सूची
  • रूस का भौतिक भूगोल
  • पर्यावरण सुरक्षा और पारिस्थिकी तंत्र 
  • G20
  • अलास्का
  • रामसर सम्मेलन
  • असंक्रमनीय भूमिधर क्या है?
  • जेनेवा अभिसमय पंचाट से आप क्या समझते हैं? 
  • न्यूयार्क अभिसमय पंचाट
  • विदेशी पंचाट (Foreign Arbitration): परिभाषा, प्रवर्तन की शर्तें 
  • किसी पक्ष की मृत्यु का मध्यस्थता समझौते पर प्रभाव
  • क्या माध्यस्थम पंचाट के विरुद्ध अपील हो सकती है?
  • February 2026 (1)
  • January 2026 (1)
  • December 2025 (2)
  • November 2025 (59)
  • October 2025 (1)
  • August 2025 (3)
  • April 2025 (2)
  • Alternative Dispute Resolution (वैकल्पिक विवाद निस्तारण) (15)
  • BNSS (1)
  • Costitution (3)
  • Environment (1)
  • GENERAL STUDY (4)
  • Human Rights (19)
  • Land Law (भूमि विधि) (15)
  • POLITY (1)
  • STATIC GK (1)
  • प्रशासनिक विधि (14)
  • About Me
  • Contact Us
  • Disclaimer
  • Privacy Policy
  • Facebook
© 2026 PADHO JANO | Powered by Superbs Personal Blog theme