परिचय नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) कानून का वह मौलिक सिद्धांत है जो वैधानिक या प्रशासनिक निर्णयों में निष्पक्षता, उपयुक्त सुनवाई और तर्कसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित करता है। यह सिद्धांत भारतीय विधि व्यवस्था में भी गहराई से समाहित है और संवैधानिक संरक्षण के साथ न्यायिक समीक्षा के आवश्यक मानदंड प्रदान करता है। परिभाषा और महत्व – परिभाषा:…
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उपप्रत्यायोजन से आप क्या समझते हैं? उप प्रत्यायोजन की अवधारणा को प्रशासनिक विधि में क्यों समाहित किया गया?
सामान्य शब्दों में जब कोई व्यक्ति अपनी शक्ति को किसी अन्य व्यक्ति को प्रत्यायोजित करता है और वह अन्य व्यक्ति इस शक्ति को पुनः प्रत्यायोजन किसी अन्य व्यक्ति को करता है तो ऐसा पुनः प्रयोजन या उपप्रत्यायोजन कहलाता है। उदाहरण यदि संसद को किसी विषय पर विधि बनाने की शक्ति है और वह अपनी शक्ति…
प्रत्यायोजित विधायन पर न्यायिक नियंत्रण की पद्धतियों की विवेचना
प्रस्तावना प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) वह विधायी तंत्र है जिसके अंतर्गत संवैधानिक या संवैधानिक निकट प्राधिकारी (अक्सर संसद या विधानमंडल) अपने कुछ विधानकारी कार्य किसी अन्य प्राधिकारी — जैसे केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, मंत्रि, प्रशासकीय विभाग या नियामक निकाय — को सौंप देता है। यह व्यवहारिकता, विशेषज्ञता और शीघ्रता के लिए आवश्यक है,…
प्रत्यायोजित विधायन पर संसदीय नियंत्रण की विवेचना कीजिये? क्या ये नियंत्रण पर्याप्त है?
प्रस्तावना प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) या अधिनियमन वह विधायी साधन है जिसके अंतर्गत संसद या राज्य विधानमंडल कुछ नियम, विनियम, आदेश, आदेशावली आदि बनाने का अधिकार किसी वैधानिक प्राधिकारी (सरकार, मंत्री, विभागीय अधिकारी, स्थानीय प्राधिकरण) को सौंप देता है। यह व्यवहार में शासन-प्रक्रिया को त्वरित, विशेषज्ञतापूर्ण और लचीलापन प्रदान करने का माध्यम है। परन्तु अतिशय…
प्रत्यायोजित विधायन की आवश्यकता और संवैधानिकता की विवेचना
प्रस्तावना प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation या Subordinate Legislation) आज के जटिल शासन तंत्र का अनिवार्य अंग बन गया है। यह वह विधायन है जिसे संसद या विधानमंडल ने सीधे बनाने के बजाय किसी अन्य प्राधिकारी (मंत्रालय, राज्य, विभाग, नियंत्रक, स्थानीय संस्था या अधिसूचित अधिकारी) को बनाने का अधिकार सौंपी होती है। प्रत्यायोजित विधायन की परिभाषा…