प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) आधुनिक शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। जब संसद या विधायिका किसी कानून की केवल मुख्य रूपरेखा (Skeleton) तैयार करती है और उसके विस्तार, नियम या उप-नियम बनाने की शक्ति कार्यपालिका (सरकार) को सौंप देती है, तो इसे ‘प्रत्यायोजित विधायन’ कहते हैं। सरल शब्दों में, इसे ‘अधीनस्थ विधान’ भी कहा…
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शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत, विकास के कारण एवं महत्व
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Theory of Separation of Powers) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक मूल आधार है। इसका सरल अर्थ है कि सरकार की शक्तियों को किसी एक व्यक्ति या संस्था में केंद्रित करने के बजाय उन्हें अलग-अलग अंगों में बाँट देना। शक्ति पृथक्करण का अर्थ इस सिद्धांत के अनुसार, सरकार के तीन मुख्य अंग…
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Separation of Powers) आधुनिक लोकतंत्र का एक आधारभूत स्तंभ है। इस सिद्धांत का मुख्य प्रतिपादक फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू (Montesquieu) को माना जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज’ (1748) में इसका विस्तार से वर्णन किया था। सिद्धांत का मूल अर्थ शक्ति पृथक्करण का अर्थ है कि राज्य…
सैद्धांतिक विधिक शोध पद्धति, पद्धति में अंतरवलित विभिन्न चरण
सैद्धांतिक विधिक शोध (Doctrinal Legal Research) विधिक शोध की वह पारंपरिक पद्धति है जिसमें शोधकर्ता किसी कानूनी समस्या का समाधान पुस्तकालयों में उपलब्ध कानूनी दस्तावेजों, विधियों, केस कानूनों और विधिक सिद्धांतों के विश्लेषण के माध्यम से खोजता है। इसे ‘डेस्क रिसर्च’ या ‘ब्लैक-लेटर लॉ’ शोध भी कहा जाता है। सैद्धांतिक विधिक शोध का अर्थ इस…
लोक अदालत के उद्देश्य और गठन, कैसे लोक अदालत द्वारा मामलों का संज्ञान लिया जा सकता है?
लोक अदालत (People’s Court) भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा और प्रभावी विकल्प है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक रूप है, जिसका मुख्य आधार ‘गांधीवादी दर्शन’ और ‘आपसी समझौता’ है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत इसे वैधानिक दर्जा प्राप्त है। लोक अदालत के संबंध में विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित है: 1. लोक…
माध्यस्थम अधिकरण
माध्यस्थम अधिकरण क्या है? इसके कार्य, शक्तियां और महत्व | Arbitral Tribunal in Hindi आज के आधुनिक और व्यावसायिक युग में विवादों का होना एक आम बात बन चुका है। जब दो व्यापारियों, कंपनियों या व्यक्तियों के बीच कोई नागरिक या व्यावसायिक विवाद होता है, तो पारंपरिक रूप से लोग अदालत (Court) का दरवाजा खटखटाते…
भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं
भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं भारत में ‘माध्यस्थम’ या ‘मध्यस्थता’ विवादों को सुलझाने की एक वैकल्पिक प्रक्रिया है, जो अदालती कार्यवाही (Litigation) के बाहर संपन्न होती है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक प्रमुख हिस्सा है। भारत में इसे माध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के…
गैर सैद्धांतिक अनुसंधान, कार्य एवं लक्षण, सैद्धांतिक एवं गैर सैद्धांतिक के मध्य अंतर
गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान (Non-Doctrinal or Empirical Research) विधि शोध की वह आधुनिक पद्धति है जो कानून को केवल किताबों या अदालती फैसलों तक सीमित न मानकर, समाज पर उसके वास्तविक प्रभाव का अध्ययन करती है। इसे ‘विधि का समाजशास्त्रीय शोध’ भी कहा जाता है। गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के लक्षण (Characteristics) गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के कार्य (Functions) सैद्धांतिक एवं…
प्राधिकारिक पूर्व निर्णय
प्राधिकारिक पूर्व निर्णय (Authoritative Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ उन न्यायिक निर्णयों से है जिन्हें अधीनस्थ न्यायालयों (Lower Courts) द्वारा मानना अनिवार्य होता है। न्यायाधीश इन निर्णयों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत रूप से उस निर्णय से सहमत हों या नहीं।…
पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत
पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत (Declarative Theory of Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पारंपरिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, न्यायाधीश कानून का निर्माण नहीं करते, बल्कि वे केवल उस कानून की खोज और घोषणा करते हैं जो पहले से ही अस्तित्व में है। सिद्धांत का मूल अर्थ घोषणात्मक सिद्धांत का मुख्य तर्क…
विधायन, विधायन के विभिन्न प्रकार
विधायन (Legislation) आधुनिक युग में विधि का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली स्रोत है। सरल शब्दों में, राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा नियमों को बनाने, उनमें संशोधन करने या उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया को विधायन कहते हैं। विधायन की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने विधायन को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है: व्यापक अर्थ में, विधायन…
रूढ़ि की परिभाषा, वैध रूढ़ि के आवश्यक तत्व
रूढ़ि (Custom) विधि के प्राचीनतम और महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। समाज में जब कोई व्यवहार या आचरण लंबे समय तक निरंतर दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे ‘रूढ़ि’ का रूप ले लेता है और उसे कानून के समान मान्यता प्राप्त हो जाती है। रूढ़ि की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने रूढ़ि को अपने-अपने ढंग…
मूल विधि और प्रक्रियात्मक विधि
विधि के वर्गीकरण में ‘सारवान विधि’ (Substantive Law) और ‘प्रक्रियात्मक विधि’ (Procedural Law) का विभाजन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं, जहाँ एक अधिकार देता है, तो दूसरा उस अधिकार को प्राप्त करने का रास्ता बताता है। 1. मूल या सारवान विधि (Substantive Law) सारवान…
विधि के वर्गीकरण का अर्थ एवं उद्देश्य
विधि के वर्गीकरण (Classification of Law) का अर्थ है कानूनों को उनकी प्रकृति, स्रोत, विषय-वस्तु और कार्यक्षेत्र के आधार पर अलग-अलग वर्गों में विभाजित करना। कानून एक व्यापक विषय है, इसलिए इसे व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वर्गीकरण अनिवार्य है। विधि के वर्गीकरण का अर्थ सरल शब्दों में, विधि का वर्गीकरण वह प्रक्रिया है…
