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माध्यस्थम (मेडिएशन) कार्यवाही के संचालन सम्बन्धी प्रावधान

Posted on November 26, 2025November 26, 2025 by KRANTI KISHORE

परिचय

माध्यस्थम (mediation) वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का एक प्रमुख साधन है जिसमें तटस्थ मध्यस्थ पक्षों के बीच आपसी वार्ता द्वारा विवाद का समाधान कराने का प्रयास करता है। भारत में मध्यस्थम सम्बन्धी प्रावधान अनेक कायनों और नियमों में निहित हैं—विशेषकर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC), वैकल्पिक विवाद निवारण विधि नीतियाँ, घरेलू विधेयक तथा कुछ विशेष क़ानूनों में। 

1. मध्यस्थम की परिभाषा तथा स्वरूप

– मध्यस्थम वह अनौपचारिक, हितग्राही-केंद्रित और स्वैच्छिक प्रक्रिया है जिसमें एक तटस्थ तीसरा पक्ष (मध्यस्थ/mediator) संवाद, समझ और समझौता स्थापित करने में मदद करता है।

– यह फर्ज़ी निर्णायक नहीं है; मध्यस्थ कोई बाध्यकारी निर्णय नहीं देता (बशर्ते पक्षों ने अलग न तय किया हो) बल्कि समझौते के लिए सहायता प्रदान करता है।

2. कानूनी आधार और संकेत

– सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), समन्वित नियम और न्यायिक संकेत मध्यस्थम के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं। सत्रहवें रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट के निर्देशों ने मध्यस्थम को सत्र प्रत्यावर्तन और केस प्रवाह कम करने के लिए प्रोत्साहित किया।

– Alternate Dispute Resolution को भारतीय विधि व्यवस्था में संवैधानिक और नीतिगत समर्थन प्राप्त है—जैसे कि राष्ट्रीय न्यायिक परिषद, मध्यस्थम परियोजनाएँ और नीतियाँ।

3. मध्यस्थम कार्यवाही के संचालन सम्बन्धी प्रमुख प्रावधान (प्रक्रियात्मक बिंदु)

a) स्वैच्छिकता एवं सहमति

– मध्यस्थम में भागीदारी मूलतः स्वैच्छिक होती है। किसी भी समय पक्ष समझौता कर सकते हैं या प्रक्रिया छोड़ सकते हैं (जब तक अनुबंधात्मक बाध्यता न हो)।

– मध्यस्थम आरम्भ करने के लिए लिखित या मौखिक सहमति पर्याप्त मानी जाती है—कई उदाहरणों में अदालत मध्यस्थम हेतु निर्देश देती है और पक्ष अदालत को मध्यस्थम रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं।

b) तटस्थता, निष्पक्षता और गोपनीयता

– मध्यस्थ का कर्तव्य: तटस्थ और निष्पक्ष रहना, पक्षों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना।

– गोपनीयता: मध्यस्थम में कही गई बातें, प्रस्ताव और कागजात सामान्यतः गोपनीय होते हैं और अदालत में सीधे साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त नहीं किए जा सकते (जब तक पक्षों ने सहमति न दी हो)। कई मध्यस्थम सहमति/समझौता दस्तावेज़ों में गोपनीयता की शर्तें शामिल होती हैं।

– पूर्वाग्रह/हितों का प्रकटीकरण: यदि मध्यस्थ के कोई हित या रिश्ता हों जो तटस्थता प्रभावित कर सकते हों, उन्हें खुलासा करना चाहिए।

c) प्रारम्भिक बैठक तथा नियमों का निर्धारण

– प्रारम्भिक (इंटेक) सत्र: प्रक्रियात्मक नियम, एजेंडा, समयसीमा, शुल्क तथा प्रारूप तय किया जाता है।

– प्रक्रिया अनौपचारिक होती है—पक्ष निजी वार्ता (कन्केन्टेशन), संयुक्त सत्र और पृथक सत्रों (कौचलेशन) का प्रयोग कर सकते हैं।

d) मध्यस्थ का अधिकार/सीमाएँ

– मध्यस्थ समझौता करने की प्रक्रिया में सलाह दे सकता है, पर विहित निर्णयधारा (adjudicatory power) नहीं रखता जब तक पक्षों ने मध्यस्थ-अनुसूचित शामिल/लिखित समझौते के तहत उसे विनियमित न किया हो।

– यदि पक्ष समझौता कर लेते हैं तो वह समझौता एक लिखित समझौता (settlement agreement) बन सकता है और अदालत में मंजूरी के अनुरूप अन्तिम आदेश/अदालत-अनुरूप निर्देश बन सकता है।

e) मध्यस्थम का रिकॉर्ड और दस्तावेज़

– मध्यस्थम के दौरान तैयार दस्तावेज़ों की प्रकृति और उनके उपयोग की सीमा: मध्यस्थ रिपोर्ट/समझौता वस्तुत: लिखित रूप में सुलह-पत्र बन सकते हैं। अन्य बातचीत सामान्यतः स्वीकृत गोपनीयता के अंतर्गत रहती है।

– कोर्ट-समर्थनित मध्यस्थता: यदि अदालत मध्यस्थम को आदेश देती है और मध्यस्थ रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है, तो वह रिपोर्ट आवश्यकतानुसार कुबूल या अस्वीकृत हो सकती है। समझौते का उल्लंघन होने पर पक्ष अदालत में समुचित याचिका कर सकता है।

4. मध्यस्थम के प्रकार और प्रक्रियात्मक भिन्नताएँ

– सरलेखित मध्यस्थम: अनौपचारिक वार्ता

– फैंसिलिटेटिव मध्यस्थम: मध्यस्थ वार्तालाप को नियंत्रित करता है पर परिणाम तय नहीं करता।

– एशिसेसन/एड्वाइज़री: मध्यस्थ कानूनी/तकनीकी राय देता है पर आदेश नहीं करता।

– न्यायाधिकरण-ऐनोटेशन वाला मध्यस्थम: कुछ प्रवाहों में मध्यस्थ सुझाए गए विकल्प देता है जिसे पक्ष विचार कर सकते हैं।

5. अदालत और मध्यस्थम का तालमेल

– कई बार न्यायालय विवादों को मध्यस्थम के लिये प्रोत्साहित/आदेश देता है—इससे केस लोड घटता है और मुद्दों का त्वरित निपटारा होता है।

– यदि मध्यस्थ द्वारा समझौता हो जाता है, पक्ष उसे स्वीकार कराकर एक दायिरा-नियत समन्वित आदेश (consent decree) या समझौता पत्र के रूप में अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं जिससे वह बाध्यकारी बनता है।

– यदि मध्यस्थम विफल रहती है, मुकदमा पुनः जारी किया जा सकता है और बीच की गोपनीय जानकारी सामान्यतः साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त नहीं होती।

6. लाभ तथा सीमाएँ (संक्षेप में)

– लाभ: लागत कम, समय की बचत, पार्टियों के बीच रिश्तों को संरक्षित करने में मदद, रचनात्मक और लचीला उपाय।

– सीमाएँ: यदि पावर असंतुलन है तो निष्पक्ष समझौता मुश्किल; गोपनीयता सीमित हो सकती है; मध्यस्थ निर्णय बाध्यकारी नहीं होता (जब तक स्वीकृत न हो)।

निष्कर्ष 

मध्यस्थम कार्यवाही के संचालन के प्रावधान कानून और न्यायिक प्रथाओं द्वारा निर्धारित होते हैं, जिनका ध्येय विवाद निपटान को तेज, किफायती और सहमति-आधारित बनाना है।

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