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पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन – UPSC और सरकारी परीक्षाओं के लिए अध्ययन सामग्री

Posted on October 12, 2026October 12, 2026 by KRANTI KISHORE

समकालीन विश्व राजनीति में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन अब केवल भूगोल का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि यह वैश्विक राजनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। 1960 के दशक से पर्यावरण को लेकर चिंताएं बढ़ने लगीं और आर्थिक विकास के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों ने राजनीतिक रूप ले लिया। यह सारांश सरकारी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए तैयार किया गया है, जिसमें पृथ्वी सम्मेलन, क्योटो प्रोटोकॉल, विश्व की साझी विरासत और इन सब पर भारत के दृष्टिकोण को विस्तार से कवर किया गया है।

1. वैश्विक राजनीति में पर्यावरण का उभरना

  • क्लब ऑव रोम (Club of Rome): 1972 में विद्वानों के इस समूह ने ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ (Limits to Growth) नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनों के विनाश की चेतावनी दी गई थी।
  • UNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम): इसने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और अध्ययनों के माध्यम से पर्यावरण की समस्याओं पर पहल शुरू की।

2. रियो सम्मेलन / पृथ्वी सम्मेलन (1992)

  • 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ, जिसे ‘पृथ्वी सम्मेलन’ कहा जाता है। इसमें 170 देशों और हज़ारों स्वयंसेवी संगठनों ने भाग लिया।
  • बर्टलैंड रिपोर्ट (1987): इस सम्मेलन से पहले ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ (Our Common Future) नामक रिपोर्ट छपी थी, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि विकास के वर्तमान तरीके टिकाऊ नहीं हैं।
  • उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के विचार: उत्तरी (विकसित) देशों की मुख्य चिंता ओज़ोन परत में छेद और ग्लोबल वार्मिंग थी। दक्षिणी (विकासशील) देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाने पर केंद्रित थे।
  • एजेंडा-21 और टिकाऊ विकास: सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता पर नियम बने और ‘अजेंडा-21’ (Agenda-21) के रूप में विकास के तरीके सुझाए गए। आर्थिक वृद्धि का ऐसा तरीका जिससे पर्यावरण को नुकसान न हो, उसे ‘टिकाऊ विकास’ (Sustainable Development) कहा गया।

3. विश्व की साझी संपदा (Global Commons)

  • ऐसी संपदा जिस पर किसी एक संप्रभु राष्ट्र का नहीं, बल्कि पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का अधिकार होता है, उसे ‘विश्व की साझी विरासत’ कहा जाता है।
  • इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।
  • इसकी सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं: अंटार्कटिका संधि (1959), मांट्रियल न्यायाचार (1987), और अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार (1991)।

4. साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ (Common but Differentiated Responsibilities)

  • 1992 के पृथ्वी सम्मेलन (UNFCCC) में यह सिद्धांत माना गया कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में विकसित देशों का ऐतिहासिक योगदान ज़्यादा है।
  • इसलिए, नुकसान की भरपाई की ज़िम्मेदारी भी विकसित देशों की अधिक होनी चाहिए और विकासशील देशों को इसमें कुछ छूट मिलनी चाहिए।

5. क्योटो प्रोटोकॉल (1997)

  • यह 1997 में जापान के क्योटो में अपनाया गया एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।
  • इसका उद्देश्य औद्योगिक देशों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना है।
  • चीन और भारत जैसे विकासशील देशों को इसकी बाध्यताओं से छूट दी गई थी, क्योंकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में उनका योगदान नाममात्र था।

6. पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष

  • भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।
  • भारत का तर्क है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है (सन् 2000 में विश्व औसत 3.8 टन था, जबकि भारत का केवल 0.9 टन था)।
  • भारत के प्रमुख कदम:
    • स्वच्छ ईंधन के लिए ‘नेशनल ऑटो-फ्यूल पॉलिसी’।
    • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (2001) और बिजली अधिनियम (2003) में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा।
    • बायोडीजल से संबंधित राष्ट्रीय मिशन।
    • 2 अक्टूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन।

7. पर्यावरण आंदोलन

  • दक्षिणी देशों (जैसे भारत, ब्राज़ील) में पर्यावरण आंदोलन इस मान्यता पर आधारित हैं कि लोग वनों में रहते हैं, जबकि उत्तरी देशों में वनों को ‘निर्जन’ माना जाता है।
  • फिलीपिंस में ऑस्ट्रेलियाई बहुराष्ट्रीय कंपनी (वेस्टर्न माइनिंग कॉरपोरेशन) के खिलाफ खनन विरोधी अभियान चला।
  • ऑस्ट्रेलिया में फ्रैंकलिन नदी को बचाने और भारत में नर्मदा आंदोलन जैसे बड़े बाँध विरोधी आंदोलन भी हुए हैं।

8. संसाधनों की भू-राजनीति (Geopolitics of Resources)

  • तेल (पेट्रोलियम): विश्व राजनीति में तेल का बहुत महत्व है। खाड़ी क्षेत्र विश्व का 30% तेल उत्पादन करता है और यहाँ 64% ज्ञात तेल भंडार मौजूद हैं। सऊदी अरब सबसे बड़ा तेल उत्पादक है।
  • पानी (जलयुद्ध): साफ़ पानी की कमी के कारण भविष्य में हिंसक संघर्ष हो सकते हैं। 1950 और 60 के दशक में इज़रायल, सीरिया और जार्डन के बीच जॉर्डन और यारमुक नदियों के पानी को लेकर संघर्ष हुआ था।

9. मूलवासी (Indigenous People) और उनके अधिकार

  • संयुक्त राष्ट्र ने 1982 में मूलवासियों की परिभाषा तय की – ऐसे लोग जो किसी देश में बहुत पुराने समय से रहते आ रहे हैं।
  • विश्व भर में लगभग 30 करोड़ मूलवासी हैं। भारत में इन्हें ‘आदिवासी’ या ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा जाता है, जो देश की आबादी का लगभग 8% हैं।

1975 में इनके अधिकारों की रक्षा के लिए ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ, जिसे UN में परामर्शदायी दर्जा प्राप्त है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ (Limits to Growth) पुस्तक किसने और कब प्रकाशित की?

उत्तर: ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ पुस्तक वैश्विक मामलों से सरोकार रखने वाले विद्वानों के समूह ‘क्लब ऑव रोम’ द्वारा 1972 में प्रकाशित की गई थी।

प्रश्न 2: ‘पृथ्वी सम्मेलन’ (Earth Summit) कब और कहाँ आयोजित हुआ था?

उत्तर: पृथ्वी सम्मेलन 1992 में ब्राज़ील के शहर रियो डी जनेरियो में आयोजित किया गया था, जिसमें 170 देशों ने हिस्सा लिया था।

प्रश्न 3: ‘विश्व की साझी संपदा’ (Global Commons) में किन क्षेत्रों को शामिल किया जाता है?

उत्तर: विश्व की साझी संपदा में पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं, जिन पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 4: ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ सिद्धांत का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सभी देशों की है (साझी), लेकिन चूंकि विकसित देशों ने पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, इसलिए उनकी जिम्मेदारी विकासशील देशों से अधिक (अलग-अलग) होनी चाहिए।

प्रश्न 5: क्योटो प्रोटोकॉल क्या है और इसे कब अपनाया गया?

उत्तर: क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसे 1997 में जापान में अपनाया गया था। इसका उद्देश्य औद्योगिक देशों द्वारा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना है।

प्रश्न 6: भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल पर कब हस्ताक्षर किए?

उत्तर: भारत ने वर्ष 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।

प्रश्न 7: क्या भारत और चीन क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं में शामिल हैं?

उत्तर: नहीं, भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से छूट दी गई है क्योंकि उनके प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन बहुत कम था।

प्रश्न 8: संसाधनों की भू-राजनीति में ‘जलयुद्ध’ (Water Wars) से क्या आशय है?

उत्तर: जब दो या दो से अधिक देशों के बीच नदी या जल संसाधनों के बंटवारे और नियंत्रण को लेकर हिंसक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसे राजनीति में ‘जलयुद्ध’ कहा जाता है। (जैसे इज़रायल, सीरिया और जार्डन का संघर्ष)।

प्रश्न 9: संयुक्त राष्ट्र ने ‘मूलवासी’ (Indigenous People) की परिभाषा कब दी थी?

उत्तर: संयुक्त राष्ट्र ने 1982 में मूलवासियों की शुरुआती परिभाषा दी थी, जिसके अनुसार ये वे लोग हैं जो किसी देश में बहुत पुराने समय से रहते आ रहे हैं।

प्रश्न 10: ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन कब हुआ?

उत्तर: मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा और उनके सरोकारों को मंच देने के लिए ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन 1975 में हुआ था।

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन – 60 MCQ

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन – 60 MCQ

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