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प्रत्यायोजित विधायन पर न्यायिक नियंत्रण की पद्धतियों की विवेचना

Posted on November 20, 2025November 20, 2025 by KRANTI KISHORE

प्रस्तावना

     प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) वह विधायी तंत्र है जिसके अंतर्गत संवैधानिक या संवैधानिक निकट प्राधिकारी (अक्सर संसद या विधानमंडल) अपने कुछ विधानकारी कार्य किसी अन्य प्राधिकारी — जैसे केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, मंत्रि, प्रशासकीय विभाग या नियामक निकाय — को सौंप देता है। यह व्यवहारिकता, विशेषज्ञता और शीघ्रता के लिए आवश्यक है, परन्तु यह विधायिका द्वारा लक्षित संवैधानिक नियंत्रण को भी कमजोर कर सकता है। अतः न्यायिक नियंत्रण (Judicial Review) का महत्व उत्पन्न होता है। 

प्रत्यायोजित विधायन का स्वभाव और कारण

– कारण: व्यवहारिक समस्याएँ, विस्तार और जटिलता, त्वरित लागू करना, तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता, नियमित संशोधनों की आवश्यकता।  

– स्वभाव: नियम, उप-नियम, आदेश, नोटिफिकेशन, दिशानिर्देश, सर्कुलर आदि रूपों में होता है।  

– संवैधानिक चिंता: नियमों का विधायिका द्वारा सीमांकन, मूल अधिकारों पर प्रभाव, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की आवश्यकता।

न्यायिक नियंत्रण की आवश्यकता और उद्देश्यों का सार

– वैधानिकता सुनिश्चित करना: प्रत्यायोजित विधायन को मूल अधिनियम के दायरे (delegated power) और उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए।  

– संविधानिकता: मूल कानून और संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध न होना चाहिए—विशेषकर मौलिक अधिकारों का हनन रोकना।  

– दुरुपयोग या अतिव्याप्ति (excess of delegation/excess scope) पर रोक।  

– प्रक्रियात्मक न्याय (procedural fairness), पारदर्शिता और सार्वजनिक हित की रक्षा।  

न्यायालय किस आधार पर नियंत्रित करते हैं — प्रमुख सिद्धांत और पद्धतियाँ

न्यायालयों ने कई आधार विकसित किए हैं जिनके जरिए वे प्रत्यायोजित विधायन को परखते हैं। प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं:

1. ultra vires सिद्धांत (अधिकार-पर्याप्ति)

– परम स्रोत: यदि उप-नियम/नोटिफिकेशन/आदेश उस शक्तितः अधिक है जो मूल अधिनियम ने प्रदान की है, तो वह ultra vires होगा।  

– दो प्रकार: (a) कार्य-सीमित ultra vires — जब प्रयोग की गई शक्ति अनाधिकृत क्षेत्र में है; (b) उद्देश्य-सीमित ultra vires — जब कार्य मूल अधिनियम के उद्देश्य के विरुद्ध है।  

– उदाहरण: A.G. v. Fulham Corporation (UK) जैसी परम्परा और भारतीय संदर्भ में Shreya Singhal-type मामलों में सिद्धांत का प्रयोग।

2. संवैधानिकता का परीक्षण

– प्रत्यायोजित विधायन मूल संविधान या किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकता।  

– न्यायालय यह जांचते हैं कि क्या विधायन विधिवत संसद/सभा के विवेक और संविधान के दायरे में है।  

– उदाहरण: भारत में केस-लॉ — (उदाहरण के लिए, Maneka Gandhi v. Union of India ने नियमों पर संसुचित प्रक्रियात्मक और मौलिक अधिकार संबंधी जांच के सिद्धांत दिए)।  

3. विधायी निर्देशों और प्रकिया का आकलन (Procedural Review)

– क्या प्रत्यायोजित विधायन बनाए जाने की प्रक्रिया विधि अनुसार की गयी—जैसे नोटिफिकेशन, परामर्श, जनहित की सुनवाई, प्रेसक्राइब्ड प्रक्रियाओं का पालन आदि।  

– नियम-निर्माण के लिए अधिनियम में यदि निश्चित प्रक्रिया बतायी गयी है, तो उसका पालन अनिवार्य होगा; उसका उल्लंघन अवैधता का कारण बनता है।  

– उदाहरण: परामर्श न लेना, नियत अवधि का उल्लंघन, या संवैधानिक प्रक्रियाओं का अतिक्रमण।  

4. सामयिकता एवं अनुपातिकता (Reasonableness and Proportionality)

– न्यायालय यह मूल्यांकित करते हैं कि प्रत्ययोजित विधायन क्या युक्तिकरण पर खरा उतरता है? क्या वह पक्षपातपूर्ण, मनमाना या अत्यधिक है?  

– अनुपातिकता परीक्षण, विशेषकर मौलिक अधिकारों के निहित मामलों में, यह देखता है कि साधन-उद्देश्य का संबंध संतुलित है या नहीं।  

– भारतीय न्यायपालिका ने Maneka Gandhi, K.S. Puttaswamy इत्यादि मामलों में reasonableness और proportionality के सिद्धांतों को अंगीकार किया है।  

5. व्याख्यात्मक नियंत्रण (Interpretative Control)

– न्यायालय प्रत्यायोजित विधायन की व्याख्या कर सकती है ताकि वह मूल अधिनियम के दायरे में रहे (narrow construction), अर्थात् न्यायालय वह अर्थ दें जो वैध बनाए रखे।  

– यह विधि विशेषकर अस्पष्ट शक्तियों या व्यापक शब्दों के प्रयोग में उपयोगी है।  

6. संशोधन पर नियंत्रण और संवैधानिक संशोधन के उल्लंघन का परीक्षण

– यदि प्रत्यायोजित विधायन संवैधानिक मूल तत्वों (basic structure) पर आघात करती है तो न्यायालय उसे रद्द कर सकते हैं।  

– लागू होने पर यह परीक्षण सीमित है परन्तु मौलिक सिद्धांतों की रक्षा के लिये उपयोगी है।  

भारतीय न्यायालयों के दृष्टान्त

– A.K. Gopalan, Maneka Gandhi, K.S. Puttaswamy आदि मामलों ने प्रशासनिक नियमों और हस्तनिर्देशों पर व्यापक समीक्षा और मौलिक अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में न्यायिक नियंत्रण के सिद्धांत विकसित किये।  

– भारतीय न्यायपालिका सामान्यतः प्रत्यायोजित विधायन पर सक्रिय समीक्षा करती है जब अधिकारों का हनन, अतिव्याप्ति या प्रक्रियात्मक उल्लंघन निहित हो।  

न्यायिक राहतें और परिणाम

– यदि न्यायालय प्रत्यायोजित विधायन को अवैध पाता है, तो वह: रद्द (declare invalid), रोक (injunction) लगा सकता है, निर्देश (mandamus) जारी कर सकता है, या वैधानिक व्याख्या के जरिए सीमित कर सकता है।  

– न्यायालय अक्सर सरकार को दोष सुधारने का अवसर देता है, विशेषकर जहां नीति-निर्माण की गुंजाइश शामिल हो।  

सीमाएँ और समस्याएँ न्यायिक नियंत्रण में

– विशेषज्ञता बनाम न्यायिकता: न्यायालय तकनीकी और नीति-निर्धारण मामलों में निर्णय देने में सीमित होते हैं।  

– न्यायिक अतिनिर्वाचन (judicial overreach) की आशंका—न्यायालय नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप कर सरकार के दायित्वों को प्रभावित कर सकता है।  

– संसाधन और समय: प्रत्यायोजित नियमों की बरीकियों की जांच में न्यायालयों का समय और संसाधन व्यय होता है।  

– वैधता बनाम कार्यक्षमता का संतुलन: आवश्यकता है कि न्यायिक समीक्षा सीमित और लक्ष्योन्मुख हो, ताकि शासन की कार्यक्षमता पर अनुचित बाधा न पड़े।  

निष्कर्ष

    प्रत्यायोजित विधायन आधुनिक शासन का अपरिहार्य अंग है; परन्तु इसकी विधिक वैधता, संवैधानिकता और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की रक्षा करने में न्यायालयों की भूमिका निर्णायक है। न्यायालयों के पास विभिन्न पद्धतियाँ—ultra vires, संवैधानिक परीक्षण, प्रक्रियात्मक समीक्षा, reasonableness/proportionality तथा व्याख्यात्मक नियंत्रण—उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से वे सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्यायोजित विधायन कानून के शासन, संवैधानिक मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों के अनुरूप रहे।

 

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