राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for Scheduled Castes — SC Commission) भारत में सामाजिक न्याय और समावेशन सुनिश्चित करने वाली एक संवैधानिक/कानूनी संस्था है। इसका उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC) समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, उनके कल्याण की निगरानी और भेदभाव-उन्मूलन की पहल करना है। यहाँ हम इसकी प्रमुख विशेषताओं, कार्यक्षेत्र, शक्तियों और चुनौतियों…
Author: KRANTI KISHORE
भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग की शक्तियों और कार्यो का आलोचनात्मक परीक्षण
भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women, NCW) की स्थापना 1992 में संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध एक स्वायत्त निकाय के रूप में नहीं हुई—यह संसद द्वारा अधिनियमित एक संवैधानिक परे संस्थान है जिसका उद्देश्य महिलाओं के संवैधानिक, वैधानिक एवं सामाजिक अधिकारों की रक्षा और संवर्द्धन करना है। समाज में लैंगिक…
भारत में मानवाधिकारों के सम्बन्ध में राज्य के नीति निदेशक तत्वों का महत्त्व
मानवाधिकार किसी भी समाज की नैतिक और कानूनी नींव होते हैं। भारत जैसे विविध सामाजिक‑राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और संवैधानिक बहुलता वाले देश में, राज्य की नीतियाँ—विशेषकर वे नीति‑निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy, DPSP) जिन्हें संविधान के भाग IV में स्थान दिया गया है—मानवाधिकार सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। यहाँ हम…
“मानवाधिकार और भारतीय संविधान के भाग ३ में प्रदत्त मौलिक अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं”
मानवाधिकार और भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार दोनों ही व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा के साधन हैं। प्रश्न यह है कि क्या इन्हें “एक ही सिक्के के दो पहलू” माना जा सकता है। यहाँ हम उनके सिद्धान्तगत आधार, व्याप्ति, स्रोत, और व्यवहारिक अनुकरण की समीक्षा करनी होगी। 1. सिद्धान्तगत समानताएं –…
मानवाधिकार यूरोपीय न्यायालय के गठन, निर्णय प्रक्रिया और क्षेत्राधिकार
मानवाधिकार यूरोपीय न्यायालय (European Court of Human Rights — ECtHR) यूरोपीय मानवाधिकार संधि (European Convention on Human Rights — ECHR) की व्याख्या और लागू करने वाला प्रमुख न्यायिक संस्थान है। इसका उद्देश्य सदस्य राज्यों द्वारा संधि में निहित मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चत करना है और व्यक्तियों, समूहों तथा राज्यों को उनके अधिकारों…
मानव अधिकारों पर वियना सम्मलेन 1993 द्वारा अंगीकार वियना घोषणा के प्रमुख बिन्दु
1. परिचय 1993 में वियना में आयोजित विश्व मानवाधिकार सम्मेलन के दौरान अंगीकार की गई वियना घोषणा और कार्रवाई कार्यक्रम (VDPA) ने विश्व मानवाधिकार आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ स्थापित किया। यह घोषणा न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता और अपरिहार्यता पर बल देती है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि ये अधिकार आपस में…
मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 के पश्चात् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उठाये गए कदम और 1966 की दीवानी एवं राजनैतिक संधि (ICCPR)
मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 के पश्चात् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उठाये गए कदम और 1966 की दीवानी एवं राजनैतिक संधि (ICCPR) तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की संधि (ICESCR) के क्रियान्वयन पर एक समेकित विवेचना प्रस्तावनामानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 10 दिसंबर 1948…
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 1948
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 1948 के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या और इसका महत्व परिचय द्वितीय विश्वयुद्ध के त्रासद अनुभवों के पश्चात् मानवता ने यह निष्कर्ष निकाला कि व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सार्वभौमिक सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसी भावना से संयुक्त राष्ट्र सभा ने 1946…
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) — मानवाधिकार क्षेत्र में योगदान
परिचय दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की स्थापना 8 दिसम्बर 1985 को काठमांडू में हुई थी। इसके संस्थापक सदस्य देश भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालेदीव और अफ़ग़ानिस्तान हैं। अप्रैल २००७ में संघ के 14वे शिखर सम्मलेन में अफगानिस्तान इसका आठवा सदस्य बना. SAARC का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया में आर्थिक, सामाजिक और…
विधि के शासन (Rule of Law) से आप क्या समझते हैं? — भारतीय संविधान के प्रावधानों की व्याख्या।
प्रस्तावनाविधि के शासन (Rule of Law) आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों का मूलभूत सिद्धांत है। यह केवल कानून का शासन नहीं, बल्कि कानून की समानता, विधि द्वारा संचालित प्रक्रिया, और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला व्यापक तत्त्व है। भारत में यह सिद्धांत न केवल संवैधान में निहित है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट व उच्चतम न्यायालयों की व्याख्याओं…