विधायन (Legislation) आधुनिक युग में विधि का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली स्रोत है। सरल शब्दों में, राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा नियमों को बनाने, उनमें संशोधन करने या उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया को विधायन कहते हैं। विधायन की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने विधायन को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है: व्यापक अर्थ में, विधायन…
Author: KRANTI KISHORE
रूढ़ि की परिभाषा, वैध रूढ़ि के आवश्यक तत्व
रूढ़ि (Custom) विधि के प्राचीनतम और महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। समाज में जब कोई व्यवहार या आचरण लंबे समय तक निरंतर दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे ‘रूढ़ि’ का रूप ले लेता है और उसे कानून के समान मान्यता प्राप्त हो जाती है। रूढ़ि की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने रूढ़ि को अपने-अपने ढंग…
मूल विधि और प्रक्रियात्मक विधि
विधि के वर्गीकरण में ‘सारवान विधि’ (Substantive Law) और ‘प्रक्रियात्मक विधि’ (Procedural Law) का विभाजन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं, जहाँ एक अधिकार देता है, तो दूसरा उस अधिकार को प्राप्त करने का रास्ता बताता है। 1. मूल या सारवान विधि (Substantive Law) सारवान…
विधि के वर्गीकरण का अर्थ एवं उद्देश्य
विधि के वर्गीकरण (Classification of Law) का अर्थ है कानूनों को उनकी प्रकृति, स्रोत, विषय-वस्तु और कार्यक्षेत्र के आधार पर अलग-अलग वर्गों में विभाजित करना। कानून एक व्यापक विषय है, इसलिए इसे व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वर्गीकरण अनिवार्य है। विधि के वर्गीकरण का अर्थ सरल शब्दों में, विधि का वर्गीकरण वह प्रक्रिया है…
अधिवक्ता कौन है? न्याय प्रशासन में अधिवक्ताओ की भूमिका
भारतीय कानूनी प्रणाली में ‘अधिवक्ता‘ (Advocate) न्याय के मंदिर का एक अनिवार्य स्तंभ है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अनुसार, अधिवक्ता वह व्यक्ति है जिसका नाम किसी राज्य विधिज्ञ परिषद (State Bar Council) की नामावली में दर्ज है और जिसे न्यायालय के समक्ष पक्ष रखने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। न्याय प्रशासन में अधिवक्ता की भूमिका…
वृत्तिक आचार से आप क्या समझते है? अधिवक्ताओ के मुवक्किल तथा अदालत के प्रति उत्तरदायित्वो की विवेचना
वृत्तिक आचार (Professional Ethics) का अर्थ उन नैतिक सिद्धांतों, नियमों और आचरणों के समूह से है, जो किसी विशिष्ट व्यवसाय के सदस्यों के व्यवहार को निर्देशित करते हैं। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) ने अधिवक्ताओं के लिए व्यावसायिक आचरण के मानक निर्धारित किए हैं। एक अधिवक्ता ‘न्यायालय का…
न्यायालय में अधिवक्ता का आचरण कैसा होना चाहिए?
न्यायालय में एक अधिवक्ता का आचरण केवल शिष्टाचार का विषय नहीं है, बल्कि यह अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) के नियमों द्वारा निर्धारित एक कानूनी बाध्यता है। एक अधिवक्ता ‘न्यायालय का अधिकारी’ (Officer of the Court) होता है, जिसका प्राथमिक कर्तव्य न्याय की प्राप्ति में सहायता करना है। न्यायालय के भीतर एक…
भारतीय विधिज्ञ परिषद द्वारा अधिवक्ताओं के अन्य नियोजनों पर क्या प्रतिबंध लगाए गए हैं? क्या कोई अधिवक्ता प्रश्न पत्रों को बनाने एवं उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का कार्य पारिश्रमिक पर कर सकता है?
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India – BCI) को अधिवक्ताओं के व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त है। BCI के नियमों के अध्याय II (भाग VI) के अनुसार, एक अधिवक्ता मुख्य रूप से न्यायालय का अधिकारी होता है, इसलिए उसके ‘अन्य…
बार बेंच से आप क्या समझते हैं? न्याय प्रशासन में बेंच और बार के स्वस्थ संबंधों का महत्व
‘बार’ और ‘बेंच’ न्यायपालिका के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। न्याय के सुचारू संचालन के लिए इन दोनों के बीच समन्वय और सम्मान का होना अनिवार्य है। भारतीय न्याय प्रणाली में इनका अर्थ और महत्व निम्नलिखित है: बार और बेंच का अर्थ संक्षेप में, ‘बार’ न्याय का पक्ष प्रस्तुत करता है और ‘बेंच’ न्याय प्रदान…
किसी अधिवक्ता को अवचार के लिए राज्य विधिक परिषद द्वारा दिए गए दंड के आदेश के विरुद्ध प्राप्त उपचार
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) के अंतर्गत एक अधिवक्ता को पेशेवर अवचार (Professional Misconduct) के लिए राज्य विधिज्ञ परिषद (State Bar Council) की अनुशासन समिति द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध प्रभावी कानूनी उपचार प्राप्त हैं। अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी अधिवक्ता को बिना पर्याप्त अवसर और अपील के अधिकार के…