मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 के पश्चात् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उठाये गए कदम और 1966 की दीवानी एवं राजनैतिक संधि (ICCPR) तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की संधि (ICESCR) के क्रियान्वयन पर एक समेकित विवेचना प्रस्तावनामानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 10 दिसंबर 1948…
Author: KRANTI KISHORE
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 1948
मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights — UDHR), 1948 के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या और इसका महत्व परिचय द्वितीय विश्वयुद्ध के त्रासद अनुभवों के पश्चात् मानवता ने यह निष्कर्ष निकाला कि व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सार्वभौमिक सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसी भावना से संयुक्त राष्ट्र सभा ने 1946…
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) — मानवाधिकार क्षेत्र में योगदान
परिचय दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की स्थापना 8 दिसम्बर 1985 को काठमांडू में हुई थी। इसके संस्थापक सदस्य देश भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालेदीव और अफ़ग़ानिस्तान हैं। अप्रैल २००७ में संघ के 14वे शिखर सम्मलेन में अफगानिस्तान इसका आठवा सदस्य बना. SAARC का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया में आर्थिक, सामाजिक और…
विधि के शासन (Rule of Law) से आप क्या समझते हैं? — भारतीय संविधान के प्रावधानों की व्याख्या।
प्रस्तावनाविधि के शासन (Rule of Law) आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों का मूलभूत सिद्धांत है। यह केवल कानून का शासन नहीं, बल्कि कानून की समानता, विधि द्वारा संचालित प्रक्रिया, और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला व्यापक तत्त्व है। भारत में यह सिद्धांत न केवल संवैधान में निहित है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट व उच्चतम न्यायालयों की व्याख्याओं…
प्रशासनिक विधि — परिभाषा तथा परिक्षेत्र
प्रस्तावना प्रशासनिक विधि (Administrative Law) आधुनिक राज्य में शासन के कार्योँ को नियमबद्ध और नियंत्रित करने वाला वह विधिक क्षेत्र है, जो कार्यपालिका (executive) और उसके अधीनस्थ संस्थाओं व अधिकारियों के कार्य-प्रवर्तन, निर्णय-प्रक्रिया तथा उनके दायित्वों और अधिकारों से संबंधित है। यह विधि नागरिकों के हितों की रक्षा करते हुए प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता, जवाबदेही…
संवैधानिक उपचार का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)
📕संवैधानिक उपचार का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)संवैधानिक उपचार का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत प्रदान किया गया है, जो नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार देता है। 🔷अनुच्छेद 32 के तहत प्रदत्त रिटअनुच्छेद 32 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय निम्नलिखित पाँच…
प्राकृतिक विधि मानव अधिकारों का आधार है?
प्राकृतिक विधि (Natural Law) और मानव अधिकारों का विचार—दोनों दार्शनिक और वैधानिक विमर्श में दीर्घकालीन रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या प्राकृतिक विधि वास्तव में मानव अधिकारों का आधार है, और यदि हां तो इसे आधुनिक कानूनी उपकरणों जैसे कि “मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम” (hypothetical या किसी वास्तविक संहितात्मक नाम के सन्दर्भ में)…
नैसर्गिक अधिकार, विधिक अधिकार और मानव अधिकार
परिचय एक समावेशी और न्यायसंगत समाज की स्थापना के लिए अधिकारों की समझ आवश्यक है। अधिकार (rights) समाज, राज्य और व्यक्ति के बीच संबंधों और जिम्मेदारियों का आधार बनते हैं। सामान्यतः अधिकारों को तीन व्यापक श्रेणियों में बाँटा जाता है: नैसर्गिक अधिकार (natural rights), विधिक अधिकार (legal rights) और मानव अधिकार (human rights)। प्रत्येक श्रेणी…
मानवाधिकारों की अवधारणा
मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो हर मानव को केवल मनुष्य होने के नाते प्राप्त होते हैं। ये अधिकार अप्रत्यक्ष, सार्वभौमिक और अविभाज्य होते हैं। मानवाधिकारों का मूल उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्ण जीवन देना और अन्याय, उत्पीड़न एवं भेदभाव से रक्षा करना है। मानवाधिकारों की अवधारणा की शुरुआत आधुनिक काल में हुई, जो मुख्यतः 18वीं…
**पूर्व में बरी और पूर्व में दोषी: सिद्धांत**
**पूर्व में बरी और पूर्व में दोषी: सिद्धांत** ये दोनों सिद्धांत **दोहरे खतरे (Double Jeopardy)** के सिद्धांत से जुड़े हैं। दोहरे खतरे का अर्थ है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता। **पूर्व में बरी (Former Acquittal):** यदि किसी व्यक्ति को…
संविधान की प्रस्तावना: एक अध्ययन
परिचय भारतीय संविधान की प्रस्तावना, जिसे उद्देशिका भी कहा जाता है, संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक भाग है। यह उन मूलभूत मूल्यों, उद्देश्यों और लक्ष्यों को निर्धारित करती है जिन पर भारत का सर्वोच्च कानून आधारित है। प्रस्तावना न केवल संविधान का एक संक्षिप्त सार प्रस्तुत करती है, बल्कि यह भारतीय राज्य के स्वरूप और…