माध्यस्थम करार (Contract of Indemnity/Guarantee? — यहाँ “माध्यस्थम” शब्द का सामान्यतः अर्थ mediation या agency/ intermediary होता है) — प्रमाणित संदर्भ के अनुसार यदि प्रश्न का आशय “माध्यस्थम करार” से मध्यस्थता करार (Contract of Mediation/Arbitration?) है तो इसे मध्यस्थता समझा जा सकता है। परन्तु भारत में विधि-विषयक दृष्टि से अक्सर “माध्यस्थम” से आशय “मध्यस्थ” (agent/…
Author: KRANTI KISHORE
माध्यस्थम (मेडिएशन) की परिभाषा एवं माध्यस्थम तथा सुलह अधिनियम, 1996 की विशेषताएँ
माध्यस्थम (Mediation) वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR) की वह प्रक्रिया है जिसमें निष्पक्ष तटस्थ तृतीय पक्ष — माध्यस्थ/मेडिएटर — विवादित पक्षों के बीच संचार व समझौता कराने के लिए मध्यस्थता करता है। इसका उद्देश्य पक्षों को पारस्परिक समझ और स्वेच्छिक समझौते के माध्यम से विवाद का समाधान दिलाना है, बिना न्यायालयीन मुकदमेबाजी के। माध्यस्थम की परिभाषा…
माध्यस्थम तथा सुलह अधिनियम, 1996 — मुख्य उद्देश्य
परिचय माध्यस्थम तथा सुलह अधिनियम, 1996 (The Arbitration and Conciliation Act, 1996) भारत में वैकल्पिक विवाद निपटान (Alternative Dispute Resolution — ADR) को व्यवस्थित करने हेतु पारित प्रमुख कानून है। यह अधिनियम 1996 में लागू हुआ और इसका उद्देश्य मध्यस्थता (arbitration) तथा सुलह/समझौता (conciliation) की प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित, आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना…
वैकल्पिक विवाद निश्चय प्रणाली (Alternative Dispute Resolution — ADR) का क्या अर्थ है?
विवादों का समाधान न्यायालय के बाहर निपटाने की प्रक्रियाओं के समुच्चय को वैकल्पिक विवाद निश्चय प्रणाली (ADR) कहते हैं। यह शब्द एक समग्र संज्ञा है जो मध्यस्थता (mediation), सुलह (conciliation), समझौता बैठकें (negotiation), पंचाट (lok adalat), निर्णायक मध्यस्थता (arbitration) तथा अन्य वैकल्पिक तरीकों को शामिल करता है। ADR का उद्देश्य समय,…
नामान्तरण क्या है? नामान्तरण का साक्ष्यिक मूल्य, नामान्तरण की प्रक्रिया और परिणाम
परिचय नामांतरण का तात्पर्य होता है वार्षिक रजिस्टर के अंदर जोरदार के नाम में परिवर्तन होना दूसरे अर्थ में एक व्यक्ति के नाम को खारिज करके दूसरे व्यक्ति का नाम उसी जगह पर डाल दिया जाना दाखिल खारिज की प्रक्रिया को तभी अपनाया जाता है जब जमीन के कब्जे में परिवर्तन होता है। नामान्तरण (नामांतरण/नामांतरण…
अपील क्या है? अपील के आधार कौन-कौन से हैं और राजस्व मामलों में यह पुनरीक्षण से कैसे भिन्न है?
परिचय “अपील” और “पुनरीक्षण” (revision) किसी भी विधिक प्रणाली में न्यायिक निर्णयों पर नियंत्रण और उसके सुधार के उपाय आवश्यक होते हैं। 1. अपील (Appeal) — परिभाषा और स्वरूप – परिभाषा: अपील वह न्यायिक उपाय है जिसके द्वारा कोई पक्ष निचली अदालत या अधिकरण के निर्णय, आदेश या निष्कर्ष को उच्च न्यायाधिकरण के समक्ष चुनौती…
सीमा चिन्ह क्या है? सीमा सम्बन्धी विवादों के निपटारे की प्रक्रिया
सीमा (boundary) किसी संपत्ति के स्वामित्व या अधिकार की भौगोलिक सीमाओं को दर्शाती है। भूमि, भवन या किसी अन्य अचल संपत्ति के मामले में सीमा चिन्ह (boundary marker/land mark) वह स्थायी या अस्थायी चिन्ह होते हैं जो दो या अधिक संपत्तियों के बीच के विभाजन को सूचित करते हैं। भारतीय संदर्भ में सीमा चिन्ह का…
राजस्व न्यायालय और राजस्व अधिकारी
प्रस्तावना राजस्व व्यवस्था भारतीय आपराधिक/नागरिक प्रक्रियाओं से अलग एक स्वायत्त प्रशासनिक-न्यायिक तंत्र है जिसका विषय भूमि, भूमि का कर (पट्टा, जगह रकबा कर), बकाया राजस्व व जमीन से संबंधित हित-संबंध होते हैं। अक्सर पूछा जाता है कि राजस्व न्यायालय (Revenue Courts) और राजस्व अधिकारी (Revenue Authorities) क्या होते हैं तथा इनके बीच मूलभूत अंतर क्या…
भू राजस्व क्या है? — उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के अधीन भू राजस्व वसूली की प्रक्रिया
परिचय भू राजस्व (Land Revenue) भारतीय राजस्व व्यवस्था का एक मौलिक घटक है। ऐतिहासिक दृष्टि से भू राजस्व भूमि से सरकार द्वारा प्राप्त किया जाने वाला वह कर या राशि है जो शासन-व्यवस्था, भूमि रिकॉर्ड एवं प्रबंधन के लिए प्रयोज्य मानी जाती है। आधुनिक संदर्भ में भू राजस्व में भूमि कर, पट्टा/किराया, भूमिधन/भू-कर और संबंधित…
राजस्व परिषद — गठन, अधिकारिता और शक्तियाँ
प्रस्तावना राजस्व परिषद (Revenue Council) भारतीय राजस्व प्रशासन की एक महत्वपूर्ण संस्थात्मक संकल्पना है, जो भूमि, कर, सरकारी आय व संबंधित विवादों के निवारण तथा नीतिगत दिशा-निर्देशन में अहम भूमिका निभाती है। परिचय राजस्व परिषद उस संस्थान को कहते हैं जिसका उद्देश्य राजस्व-संबंधी मामलों जैसे भूमि कर, भूमि का मालिकाना, राजस्व संग्रहण, राजस्व न्यायालयों के…
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता २००६ के अधीन किन किन मामलो में प्रथम और द्वितीय अपील हो सकती है?क्या सिविल प्रक्रिया संहिता १९०८ और परिसीम अधिनियम १९६३ से प्रावधान राजस्व न्यायालयों पर लागू होंगे?
प्रस्तावना उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (आगे “संहिता”) ग्रामीण/राजस्व न्यायालयों में भूमि-संबंधी विवादों के निपटारे का मुख्य कानूनी ढाँचा है। दो पृथक परन्तु संबंधित मुद्दे पूछे गए हैं: (1) किन-किन मामलों में प्रथम व द्वितीय अपील सम्भव है; और (2) क्या सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) तथा परिसीमन अधिनियम, 1963 के प्रावधान राजस्व न्यायालयों पर…
जोत के पट्टे का अर्थ और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के अधीन पट्टा किसे मिल सकता है —
परिचय अधिकार वर्णन और खेती योग्य भूमि के स्वत्व-संबंधी प्रश्नों में “जोत” और “पट्टा” का अर्थ तथा पट्टा किसे दिया जा सकता है—यह समझना महत्त्वपूर्ण है। 1. जोत का अर्थ – सामान्य अर्थ: जोत से आशय सामान्यतः खेत की वह भागी भूमि है जिसे व्यक्तिगत रूप से जोता गया हो; यानी जो एक कृषक द्वारा…
बेदखली से आप क्या समझते हैं? — उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के संदर्भ में आसामी को किन अधिकारों पर बेदखल किया जा सकता है? — गलत बेदखली के विरुद्ध उपचार
परिचय बेदखली (Eviction) भूमि-संबंधी विवादों में एक सामान्य प्रथा है जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति (आसामी/किरायेदार/अधिवासी) को किसी संपत्ति या भू-भाग से हटाना है। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (UP Revenue Code, 2006) व संबंधित प्रावधानों के तहत बेदखली की प्रक्रियाएँ, कारण और आसामी के अधिकार विस्तारपूर्वक विनियमित हैं। 1. बेदखली का अर्थ (परिभाषा) – सामान्य…
संक्रमणीय अधिकार वाले भूमिधर से आप क्या समझते हैं? उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता २००६ में वर्णित असंक्रमनीय अधिकार वाले भूमिधर के अधिकारों की विवेचना कीजिये?
प्रस्तावना भूमिधर (occupant/landholder) और उसके अधिकार भारतीय भूमि कानून एवं राजस्व व्यवस्थाओं का महत्वपूर्ण अंग हैं। एनविख्यात श्रेणियों में “संक्रमणीय अधिकार” (transferable rights) और “असंक्रमनीय अधिकार” (non-transferable/inalienable rights) का विभाजन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इससे न केवल व्यक्ति के निजी स्वत्व व लेन-देन की क्षमता निर्धारित होती है, बल्कि सार्वजनिक नीति, सामाजिक हित और…
ग्राम पंचायत — परिभाषा, कार्य और शक्तियाँ
परिचय ग्राम पंचायत भारतीय स्थानीय स्वशासन प्रणाली की सबसे निचली इकाई है। यह ग्राम स्तर पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का माध्यम है और ग्रामीण विकास, समेकित लोककल्याण व स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी निभाती है। 1. परिभाषा ग्राम पंचायत (Gram Panchayat) स्थानीय आत्म-शासन का प्राथमिक निकाय है जो ग्राम स्तर पर ग्रामवासियों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के…
ग्राम सभा क्या है? — ग्राम सभा के कार्य और शक्तियाँ
परिचय ग्राम सभा भारतीय लोक प्रशासन की सबसे निचली और महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक इकाई है। यह ग्राम पंचायत के क्षेत्र में रहने वाले सभी मतदाता — यानी 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के निवासियों — का सम्मिलित निकाय है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन (1992) ने ग्राम सभा को स्थानीय स्वशासन प्रणाली का केन्द्रिक…
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 — प्रमुख विशेषताएँ
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (Uttar Pradesh Revenue Code, 2006) प्रदेश की भूमि और राजस्व संबंधी व्यवस्थाओं को व्यवस्थित करने हेतु पारित एक समेकित कानून है। यह संहिता पुराने राजस्व कानूनों और नियमों का संशोधन तथा समायोजन करते हुए राजस्व प्रशासन, निजी और सरकारी भूमि के अधिकार, रिकार्ड की व्यवस्था, कर–उपार्जन व वसूलियाँ, नक्सल एवं…
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006
परिचय उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (उत्तर प्रदेश एक्ट नंबर — सामान्यतः “UP Revenue Code, 2006”) राज्य की भूमि व्यवस्था, राजस्व प्रशासन और संबंधित प्रक्रियात्मक नियमों का समेकित कानूनी ढांचा प्रस्तुत करती है। यह संहिता भूमि रिकॉर्ड, जमींदारी/किसानों के अधिकार, कर-निर्धारण, आबादी और राजस्व न्यायालयों से जुड़ी प्रक्रियाओं को विनियमित करती है। संक्षिप्त परिभाषा और…
“अपने मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता”
किसी भी विधिक व्यवस्था में निष्पक्षता और धार्मिकता (impartiality and fairness) का सिद्धांत सर्वोपरि होता है। इस सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने मामलों में न्यायाधीश नहीं बन सकता (nemo judex in causa sua)। यह सिद्धांत न केवल न्यायिक प्रक्रिया की नैतिकता का आधार है बल्कि कानूनी नियमों और…
न्यायपालिका किस प्रकार प्रशासनिक अधिकरण को नियंत्रित करती है?
परिचय न्यायपालिका और प्रशासनिक अधिकरण—दोनों ही शासन के महत्वपूर्ण अंग हैं। प्रशासनिक अधिकरण विशेषज्ञता-आधारित, शीघ्र और तकनीकी विवाद निपटान के साधन हैं; वहीं न्यायपालिका संवैधानिक महत्व की रक्षा, नियमों के पालन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित करती है। इसलिए न्यायपालिका का प्रशासनिक अधिकरणों पर नियन्त्रण आवश्यक है ताकि वे विधि के शासन…