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Author: KRANTI KISHORE

BA, (PSYCHOLOGY, HINDI, ECONOMICS, POLITICAL SCIENCE) LLB, M.A.(ECONOMICS),

व्यावसायिक भाषण, सरकारी विज्ञापनों के संबंध में बधाई नीति

Posted on April 4, 2026April 4, 2026 by KRANTI KISHORE

व्यावसायिक भाषण (Commercial Speech) व्यावसायिक भाषण का अर्थ है ऐसा संवाद या अभिव्यक्ति जिसका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक लाभ प्राप्त करना होता है। विधि शास्त्र के अनुसार, यह वह अभिव्यक्ति है जो किसी उत्पाद, सेवा या व्यवसाय के प्रचार-प्रसार के लिए की जाती है। मुख्य विशेषताएं: व्यावसायिक भाषण और सरकारी विज्ञापन नीति 1. व्यावसायिक भाषण (Commercial…

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लोक अदालत के उद्देश्य और गठन, कैसे लोक अदालत द्वारा मामलों का संज्ञान लिया जा सकता है?

Posted on April 3, 2026April 3, 2026 by KRANTI KISHORE

लोक अदालत (People’s Court) भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा और प्रभावी विकल्प है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक रूप है, जिसका मुख्य आधार ‘गांधीवादी दर्शन’ और ‘आपसी समझौता’ है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत इसे वैधानिक दर्जा प्राप्त है। लोक अदालत के संबंध में विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित है: 1. लोक…

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माध्यस्थम अधिकरण क्या है Arbitral Tribunal in Hindi

माध्यस्थम अधिकरण

Posted on April 2, 2026September 8, 2026 by KRANTI KISHORE

माध्यस्थम अधिकरण क्या है? इसके कार्य, शक्तियां और महत्व | Arbitral Tribunal in Hindi आज के आधुनिक और व्यावसायिक युग में विवादों का होना एक आम बात बन चुका है। जब दो व्यापारियों, कंपनियों या व्यक्तियों के बीच कोई नागरिक या व्यावसायिक विवाद होता है, तो पारंपरिक रूप से लोग अदालत (Court) का दरवाजा खटखटाते…

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भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं

Posted on April 2, 2026April 2, 2026 by KRANTI KISHORE

भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं भारत में ‘माध्यस्थम’ या ‘मध्यस्थता’ विवादों को सुलझाने की एक वैकल्पिक प्रक्रिया है, जो अदालती कार्यवाही (Litigation) के बाहर संपन्न होती है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक प्रमुख हिस्सा है। भारत में इसे माध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के…

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गैर सैद्धांतिक अनुसंधान, कार्य एवं लक्षण, सैद्धांतिक एवं गैर सैद्धांतिक के मध्य अंतर

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान (Non-Doctrinal or Empirical Research) विधि शोध की वह आधुनिक पद्धति है जो कानून को केवल किताबों या अदालती फैसलों तक सीमित न मानकर, समाज पर उसके वास्तविक प्रभाव का अध्ययन करती है। इसे ‘विधि का समाजशास्त्रीय शोध’ भी कहा जाता है। गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के लक्षण (Characteristics) गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के कार्य (Functions) सैद्धांतिक एवं…

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प्राधिकारिक पूर्व निर्णय

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

प्राधिकारिक पूर्व निर्णय (Authoritative Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ उन न्यायिक निर्णयों से है जिन्हें अधीनस्थ न्यायालयों (Lower Courts) द्वारा मानना अनिवार्य होता है। न्यायाधीश इन निर्णयों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत रूप से उस निर्णय से सहमत हों या नहीं।…

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पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत (Declarative Theory of Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पारंपरिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, न्यायाधीश कानून का निर्माण नहीं करते, बल्कि वे केवल उस कानून की खोज और घोषणा करते हैं जो पहले से ही अस्तित्व में है। सिद्धांत का मूल अर्थ घोषणात्मक सिद्धांत का मुख्य तर्क…

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विधायन, विधायन के विभिन्न प्रकार

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

विधायन (Legislation) आधुनिक युग में विधि का सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली स्रोत है। सरल शब्दों में, राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा नियमों को बनाने, उनमें संशोधन करने या उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया को विधायन कहते हैं। विधायन की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने विधायन को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है: व्यापक अर्थ में, विधायन…

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रूढ़ि की परिभाषा, वैध रूढ़ि के आवश्यक तत्व

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

रूढ़ि (Custom) विधि के प्राचीनतम और महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। समाज में जब कोई व्यवहार या आचरण लंबे समय तक निरंतर दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे ‘रूढ़ि’ का रूप ले लेता है और उसे कानून के समान मान्यता प्राप्त हो जाती है। रूढ़ि की परिभाषा विभिन्न विधिशास्त्रियों ने रूढ़ि को अपने-अपने ढंग…

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मूल विधि और प्रक्रियात्मक विधि

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

विधि के वर्गीकरण में ‘सारवान विधि’ (Substantive Law) और ‘प्रक्रियात्मक विधि’ (Procedural Law) का विभाजन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं, जहाँ एक अधिकार देता है, तो दूसरा उस अधिकार को प्राप्त करने का रास्ता बताता है। 1. मूल या सारवान विधि (Substantive Law) सारवान…

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विधि के वर्गीकरण का अर्थ एवं उद्देश्य

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

विधि के वर्गीकरण (Classification of Law) का अर्थ है कानूनों को उनकी प्रकृति, स्रोत, विषय-वस्तु और कार्यक्षेत्र के आधार पर अलग-अलग वर्गों में विभाजित करना। कानून एक व्यापक विषय है, इसलिए इसे व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वर्गीकरण अनिवार्य है। विधि के वर्गीकरण का अर्थ सरल शब्दों में, विधि का वर्गीकरण वह प्रक्रिया है…

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अधिवक्ता कौन है? न्याय प्रशासन में अधिवक्ताओ की भूमिका

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

भारतीय कानूनी प्रणाली में ‘अधिवक्ता‘ (Advocate) न्याय के मंदिर का एक अनिवार्य स्तंभ है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अनुसार, अधिवक्ता वह व्यक्ति है जिसका नाम किसी राज्य विधिज्ञ परिषद (State Bar Council) की नामावली में दर्ज है और जिसे न्यायालय के समक्ष पक्ष रखने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। न्याय प्रशासन में अधिवक्ता की भूमिका…

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वृत्तिक आचार से आप क्या समझते है? अधिवक्ताओ के मुवक्किल तथा अदालत के प्रति उत्तरदायित्वो की विवेचना

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

वृत्तिक आचार (Professional Ethics) का अर्थ उन नैतिक सिद्धांतों, नियमों और आचरणों के समूह से है, जो किसी विशिष्ट व्यवसाय के सदस्यों के व्यवहार को निर्देशित करते हैं। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) ने अधिवक्ताओं के लिए व्यावसायिक आचरण के मानक निर्धारित किए हैं। एक अधिवक्ता ‘न्यायालय का…

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न्यायालय में अधिवक्ता का आचरण कैसा होना चाहिए?

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

न्यायालय में एक अधिवक्ता का आचरण केवल शिष्टाचार का विषय नहीं है, बल्कि यह अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) के नियमों द्वारा निर्धारित एक कानूनी बाध्यता है। एक अधिवक्ता ‘न्यायालय का अधिकारी’ (Officer of the Court) होता है, जिसका प्राथमिक कर्तव्य न्याय की प्राप्ति में सहायता करना है। न्यायालय के भीतर एक…

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भारतीय विधिज्ञ परिषद द्वारा अधिवक्ताओं के अन्य नियोजनों पर क्या प्रतिबंध लगाए गए हैं? क्या कोई अधिवक्ता प्रश्न पत्रों को बनाने एवं उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का कार्य पारिश्रमिक पर कर सकता है?

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India – BCI) को अधिवक्ताओं के व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त है। BCI के नियमों के अध्याय II (भाग VI) के अनुसार, एक अधिवक्ता मुख्य रूप से न्यायालय का अधिकारी होता है, इसलिए उसके ‘अन्य…

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बार बेंच से आप क्या समझते हैं? न्याय प्रशासन में बेंच और बार के स्वस्थ संबंधों का महत्व

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

‘बार’ और ‘बेंच’ न्यायपालिका के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। न्याय के सुचारू संचालन के लिए इन दोनों के बीच समन्वय और सम्मान का होना अनिवार्य है। भारतीय न्याय प्रणाली में इनका अर्थ और महत्व निम्नलिखित है: बार और बेंच का अर्थ संक्षेप में, ‘बार’ न्याय का पक्ष प्रस्तुत करता है और ‘बेंच’ न्याय प्रदान…

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किसी अधिवक्ता को अवचार के लिए राज्य विधिक परिषद द्वारा दिए गए दंड के आदेश के विरुद्ध प्राप्त उपचार

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) के अंतर्गत एक अधिवक्ता को पेशेवर अवचार (Professional Misconduct) के लिए राज्य विधिज्ञ परिषद (State Bar Council) की अनुशासन समिति द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध प्रभावी कानूनी उपचार प्राप्त हैं। अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी अधिवक्ता को बिना पर्याप्त अवसर और अपील के अधिकार के…

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न्यायालय के अवमान की परिभाषा, अवमान के प्रकार, न्यायालय के अवमान के लिए दंड

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 भारतीय न्यायपालिका की गरिमा, शक्ति और अधिकार की रक्षा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण है। यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय के आदेशों का पालन हो और न्याय प्रशासन में कोई बाधा न आए। यहाँ न्यायालय अवमान की परिभाषा, इसके प्रकार और दंड का विस्तृत विवरण दिया गया है:…

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कौन-कौन सी न्यायायिक कार्यवाही और प्रकाशन न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971 के अंतर्गत नहीं आती है?

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना है। हालांकि, यह अधिनियम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उचित रिपोर्टिंग के बीच संतुलन बनाने के लिए कुछ विशिष्ट अपवाद प्रदान करता है। अधिनियम की धारा 3 से धारा 7 तक उन कार्यों और प्रकाशनों का वर्णन किया…

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न्यायालय अवमान के विरुद्ध एक अधिवक्ता को प्राप्त उपचार

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के अंतर्गत, एक अधिवक्ता को अवमानना की कार्यवाही के विरुद्ध कई कानूनी और प्रक्रियात्मक उपचार प्राप्त हैं। ये उपचार मुख्य रूप से न्यायपालिका की गरिमा और अधिवक्ता की व्यावसायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए दिए गए हैं। एक अधिवक्ता के पास उपलब्ध प्रमुख उपचारों का विवरण निम्नलिखित है:…

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