लोक अदालत (People’s Court) भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा और प्रभावी विकल्प है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक रूप है, जिसका मुख्य आधार ‘गांधीवादी दर्शन’ और ‘आपसी समझौता’ है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत इसे वैधानिक दर्जा प्राप्त है। लोक अदालत के संबंध में विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित है: 1. लोक…
Author: KRANTI KISHORE
प्रत्यायोजित विधायन, सबसे प्रभावी नियंत्रण कौन सा है?
प्रत्यायोजित विधायन (Delegated Legislation) आधुनिक शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। जब संसद या विधायिका किसी कानून की केवल मुख्य रूपरेखा (Skeleton) तैयार करती है और उसके विस्तार, नियम या उप-नियम बनाने की शक्ति कार्यपालिका (सरकार) को सौंप देती है, तो इसे ‘प्रत्यायोजित विधायन’ कहते हैं। सरल शब्दों में, इसे ‘अधीनस्थ विधान’ भी कहा…
शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत, विकास के कारण एवं महत्व
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Theory of Separation of Powers) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक मूल आधार है। इसका सरल अर्थ है कि सरकार की शक्तियों को किसी एक व्यक्ति या संस्था में केंद्रित करने के बजाय उन्हें अलग-अलग अंगों में बाँट देना। शक्ति पृथक्करण का अर्थ इस सिद्धांत के अनुसार, सरकार के तीन मुख्य अंग…
माध्यस्थम अधिकरण
माध्यस्थम अधिकरण (Arbitral Tribunal) एक गैर-न्यायिक संस्था है जिसे विवादों के समाधान के लिए ‘माध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996’ के तहत गठित किया जाता है। सरल शब्दों में, जब दो पक्ष अपने विवाद को पारंपरिक अदालत (कोर्ट) के बाहर सुलझाने का निर्णय लेते हैं, तो वे एक या एक से अधिक निष्पक्ष व्यक्तियों को चुनते…
भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं
भारत में माध्यस्थम (Arbitration) विधि की अवधारणा एवं आवश्यकताएं भारत में ‘माध्यस्थम’ या ‘मध्यस्थता’ विवादों को सुलझाने की एक वैकल्पिक प्रक्रिया है, जो अदालती कार्यवाही (Litigation) के बाहर संपन्न होती है। यह ‘वैकल्पिक विवाद समाधान’ (ADR) का एक प्रमुख हिस्सा है। भारत में इसे माध्यस्थम और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के…
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत
शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Separation of Powers) आधुनिक लोकतंत्र का एक आधारभूत स्तंभ है। इस सिद्धांत का मुख्य प्रतिपादक फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू (Montesquieu) को माना जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज’ (1748) में इसका विस्तार से वर्णन किया था। सिद्धांत का मूल अर्थ शक्ति पृथक्करण का अर्थ है कि राज्य…
गैर सैद्धांतिक अनुसंधान, कार्य एवं लक्षण, सैद्धांतिक एवं गैर सैद्धांतिक के मध्य अंतर
गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान (Non-Doctrinal or Empirical Research) विधि शोध की वह आधुनिक पद्धति है जो कानून को केवल किताबों या अदालती फैसलों तक सीमित न मानकर, समाज पर उसके वास्तविक प्रभाव का अध्ययन करती है। इसे ‘विधि का समाजशास्त्रीय शोध’ भी कहा जाता है। गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के लक्षण (Characteristics) गैर-सैद्धांतिक अनुसंधान के कार्य (Functions) सैद्धांतिक एवं…
सैद्धांतिक विधिक शोध पद्धति, पद्धति में अंतरवलित विभिन्न चरण
सैद्धांतिक विधिक शोध (Doctrinal Legal Research) विधिक शोध की वह पारंपरिक पद्धति है जिसमें शोधकर्ता किसी कानूनी समस्या का समाधान पुस्तकालयों में उपलब्ध कानूनी दस्तावेजों, विधियों, केस कानूनों और विधिक सिद्धांतों के विश्लेषण के माध्यम से खोजता है। इसे ‘डेस्क रिसर्च’ या ‘ब्लैक-लेटर लॉ’ शोध भी कहा जाता है। सैद्धांतिक विधिक शोध का अर्थ इस…
प्राधिकारिक पूर्व निर्णय
प्राधिकारिक पूर्व निर्णय (Authoritative Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ उन न्यायिक निर्णयों से है जिन्हें अधीनस्थ न्यायालयों (Lower Courts) द्वारा मानना अनिवार्य होता है। न्यायाधीश इन निर्णयों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत रूप से उस निर्णय से सहमत हों या नहीं।…
पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत
पूर्व निर्णय का घोषणात्मक सिद्धांत (Declarative Theory of Precedent) विधिशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पारंपरिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, न्यायाधीश कानून का निर्माण नहीं करते, बल्कि वे केवल उस कानून की खोज और घोषणा करते हैं जो पहले से ही अस्तित्व में है। सिद्धांत का मूल अर्थ घोषणात्मक सिद्धांत का मुख्य तर्क…