अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(c) के तहत भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India – BCI) को अधिवक्ताओं के व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त है। BCI के नियमों के अध्याय II (भाग VI) के अनुसार, एक अधिवक्ता मुख्य रूप से न्यायालय का अधिकारी होता है, इसलिए उसके ‘अन्य नियोजनों’ (Other Employments) पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं।
इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिवक्ता का पूरा ध्यान न्याय प्रशासन और अपने मुवक्किल के हितों पर रहे।
1. अन्य नियोजनों पर सामान्य प्रतिबंध (नियम 47 से 52)
BCI के नियम स्पष्ट करते हैं कि एक अधिवक्ता एक साथ दो व्यवसायों में संलग्न नहीं हो सकता। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पूर्णकालिक रोजगार पर रोक (नियम 47): कोई भी अधिवक्ता, जब तक वह अभ्यास (Practice) कर रहा है, किसी भी सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, या निजी व्यक्ति/संस्था के अधीन पूर्णकालिक (Full-time) वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य नहीं कर सकता। यदि वह ऐसा रोजगार स्वीकार करता है, तो उसे अपनी सनद (Enrollment) राज्य विधिज्ञ परिषद को सौंपनी होगी।
- व्यापार या व्यवसाय (नियम 48): एक अधिवक्ता प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यापार का प्रबंधन नहीं कर सकता। वह किसी कंपनी का ‘प्रबंध निदेशक’ (Managing Director) या ‘सचिव’ नहीं बन सकता। हालांकि, वह किसी कंपनी के ऐसे ‘निदेशक’ (Director) के रूप में कार्य कर सकता है जिसे प्रबंधन की शक्तियां प्राप्त न हों (Sleeping Director)।
- पारिवारिक व्यवसाय (नियम 49): वह अपने परिवार के पुश्तैनी व्यवसाय में ‘सुप्त भागीदार’ (Sleeping Partner) के रूप में लाभ ले सकता है, लेकिन वह स्वयं उस व्यवसाय के सक्रिय संचालन में भाग नहीं ले सकता।
2. अनुमति प्राप्त अंशकालिक कार्य (Exceptions)
कुछ विशिष्ट कार्यों को BCI ने अधिवक्ता के पेशे की गरिमा के अनुकूल माना है और उन्हें करने की अनुमति दी है:
- कानूनी शिक्षण: एक अधिवक्ता किसी विधि महाविद्यालय में अंशकालिक (Part-time) शिक्षण कार्य कर सकता है, बशर्ते वह कार्य समय प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक न हो।
- लेखन और प्रसारण: समाचार पत्रों में लेख लिखना, कानूनी पुस्तकें प्रकाशित करना या रेडियो/टीवी पर कानूनी चर्चाओं में भाग लेना प्रतिबंधित नहीं है।
3. प्रश्न पत्र निर्माण और उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन
आपके विशिष्ट प्रश्न—“क्या कोई अधिवक्ता प्रश्न पत्रों को बनाने एवं उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन का कार्य पारिश्रमिक पर कर सकता है?”—का उत्तर “हाँ” है।
BCI के नियमों (नियम 52) और विभिन्न न्यायिक व्याख्याओं के अनुसार, एक अधिवक्ता निम्नलिखित शैक्षणिक गतिविधियों में पारिश्रमिक (Remuneration) पर संलग्न हो सकता है:
- शैक्षणिक योगदान: प्रश्न पत्र सेट करना, उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करना (Evaluation), और मौखिक परीक्षा (Viva-voce) में परीक्षक (Examiner) के रूप में कार्य करना अधिवक्ता के पेशे के विरुद्ध नहीं माना जाता।
- तर्क (Rationale): इन कार्यों को “रोजगार” (Employment) के बजाय “शैक्षणिक सेवा” (Academic Service) माना जाता है। चूंकि यह कार्य निरंतर या पूर्णकालिक प्रकृति का नहीं होता और इससे अधिवक्ता की न्यायालय के प्रति प्रतिबद्धता में बाधा नहीं आती, इसलिए इसे स्वीकार्य माना गया है।
- पारिश्रमिक: इसके लिए प्राप्त होने वाला मानदेय या पारिश्रमिक कानूनी रूप से वैध है। इसे ‘व्यवसाय’ (Business) नहीं माना जाता।
4. प्रतिबंधों का उल्लंघन और परिणाम
यदि कोई अधिवक्ता इन नियमों का उल्लंघन कर गुप्त रूप से पूर्णकालिक नौकरी या सक्रिय व्यापार करता है, तो:
- यह ‘पेशेवर कदाचार‘ (Professional Misconduct) माना जाता है।
- राज्य विधिज्ञ परिषद उसकी सनद (License) को निलंबित या रद्द कर सकती है।
- अनुशासन समिति उस पर जुर्माना लगा सकती है।
निष्कर्ष
भारतीय विधिज्ञ परिषद का मानना है कि ‘कानून एक ईर्ष्यालु प्रेमिका है’ (Law is a jealous mistress), जो पूर्ण समर्पण की मांग करती है। इसलिए, अधिवक्ता को किसी भी ऐसे व्यवसाय से बचना चाहिए जो उसकी गरिमा या समय को प्रभावित करे। हालांकि, प्रश्न पत्र निर्माण और मूल्यांकन जैसे कार्य बौद्धिक और शैक्षणिक प्रकृति के होने के कारण पूर्णतः अनुमत हैं, क्योंकि ये कानूनी शिक्षा के स्तर को बनाए रखने में सहायक होते हैं।