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न्यायालय के अवमान की परिभाषा, अवमान के प्रकार, न्यायालय के अवमान के लिए दंड

Posted on April 1, 2026April 1, 2026 by KRANTI KISHORE

न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 भारतीय न्यायपालिका की गरिमा, शक्ति और अधिकार की रक्षा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण है। यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय के आदेशों का पालन हो और न्याय प्रशासन में कोई बाधा न आए।

यहाँ न्यायालय अवमान की परिभाषा, इसके प्रकार और दंड का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. न्यायालय अवमान की परिभाषा (Definition)

न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(a) के अनुसार, “न्यायालय की अवमानना” का अर्थ ‘सिविल अवमानना‘ या ‘अपराधिक अवमानना‘ है।

सरल शब्दों में, जब कोई व्यक्ति जानबूझकर न्यायालय के किसी आदेश, डिक्री या निर्देश की अवज्ञा करता है, या ऐसा कोई कार्य करता है जिससे न्यायालय की प्रतिष्ठा कम होती है या न्याय प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है, तो उसे ‘न्यायालय की अवमानना’ कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 (उच्चतम न्यायालय के लिए) और अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालयों के लिए) के तहत अदालतों को अवमानना के लिए दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है।

2. न्यायालय अवमान के प्रकार (Types of Contempt)

अधिनियम के अनुसार अवमानना मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

(क) सिविल अवमानना (Civil Contempt – धारा 2(b))

सिविल अवमानना का अर्थ है:

  • न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, निर्देश, आदेश या अन्य प्रक्रिया की जानबूझकर अवज्ञा (Wilful Disobedience) करना।
  • न्यायालय को दिए गए किसी वचन (Undertaking) का जानबूझकर उल्लंघन करना।
    यह आमतौर पर निजी पक्षों के बीच के विवादों से संबंधित होता है जहाँ एक पक्ष अदालत के आदेश को मानने से इनकार कर देता है।

(ख) आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt – धारा 2(c))

आपराधिक अवमानना अधिक गंभीर होती है। इसमें किसी भी ऐसी बात का प्रकाशन (शब्दों, संकेतों या दृश्यों द्वारा) या किसी ऐसे कार्य का करना शामिल है जो:

  1. स्कैंडलाइज करना: न्यायालय के अधिकार को कम करता है या उसे बदनाम (Scandalize) करने की कोशिश करता है।
  2. हस्तक्षेप: किसी भी न्यायिक कार्यवाही के उचित संचालन में प्रतिकूल प्रभाव डालता है या हस्तक्षेप करता है।
  3. बाधा डालना: न्याय के प्रशासन में किसी भी अन्य तरीके से बाधा (Obstruction) उत्पन्न करता है।

3. न्यायालय अवमान के लिए दंड (Punishment – धारा 12)

न्यायालय अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत अवमानना के लिए दंड का प्रावधान किया गया है। न्यायालय निम्नलिखित दंड दे सकता है:

  • साधारण कारावास: दोषी व्यक्ति को अधिकतम 6 महीने तक की जेल की सजा दी जा सकती है।
  • आर्थिक दंड (Fine): अपराधी पर अधिकतम 2,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • दोनों: न्यायालय अपराध की गंभीरता को देखते हुए जेल और जुर्माना दोनों की सजा एक साथ दे सकता है।

विशेष प्रावधान:

  1. क्षमा याचना: यदि अपराधी न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार ‘बिना शर्त क्षमा’ (Unconditional Apology) मांगता है, तो न्यायालय उसकी सजा माफ कर सकता है या उसे कम कर सकता है।
  2. कंपनियों के लिए: यदि अवमानना किसी कंपनी द्वारा की गई है, तो उसके लिए जिम्मेदार निदेशक (Director) या अधिकारी को दंडित किया जा सकता है।
  3. सिविल अवमानना में विशेष जेल: यदि न्यायालय को लगता है कि जुर्माना पर्याप्त नहीं है, तो वह व्यक्ति को सिविल जेल भेज सकता है।

4. मर्यादा (Limitation – धारा 20)

अधिनियम की धारा 20 एक महत्वपूर्ण सीमा तय करती है। इसके अनुसार, न्यायालय अवमानना की कार्यवाही उस तिथि से एक वर्ष बीत जाने के बाद शुरू नहीं कर सकता, जिस दिन अवमानना घटित हुई थी। एक वर्ष के बाद अवमानना का संज्ञान नहीं लिया जा सकता।

निष्कर्ष न्यायालय की अवमानना की शक्ति का उद्देश्य न्यायाधीशों की व्यक्तिगत सुरक्षा करना नहीं है, बल्कि ‘न्याय की प्रक्रिया’ की पवित्रता बनाए रखना है। जहाँ एक ओर सिविल अवमानना आदेशों के पालन पर जोर देती है, वहीं आपराधिक अवमानना संस्थागत सम्मान की रक्षा करती है। हालांकि, न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग बहुत संयम के साथ और केवल स्पष्ट मामलों में ही करते हैं।

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