आज भले ही लोकतंत्र में महिलाओं और पुरुषों को बराबर वोट देने का अधिकार है, लेकिन इतिहास में इस समानता को पाने के लिए महिलाओं को एक लंबा और कड़ा संघर्ष (Suffrage Movement) करना पड़ा है। आइए जानते हैं कि दुनिया और भारत में महिलाओं को पहली बार यह अधिकार कब मिला।
वैश्विक स्तर पर महिलाओं का मताधिकार (Global History)
- न्यूजीलैंड (1893) – विश्व में सबसे पहले: महिलाओं को वोट देने का पूर्ण अधिकार देने वाला न्यूजीलैंड दुनिया का पहला देश है। यहाँ 19 सितंबर 1893 को ऐतिहासिक कानून पारित कर सभी वयस्क महिलाओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने की आजादी दी गई।
- ऑस्ट्रेलिया (1902): ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने महिलाओं को न सिर्फ वोट देने का अधिकार दिया, बल्कि उन्हें संसद के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की भी अनुमति दी।
- फिनलैंड (1906): यह महिलाओं को पूर्ण मतदान और चुनाव लड़ने का समान अधिकार देने वाला यूरोप का पहला देश बना।
- अमेरिका (1920): अमेरिका जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में भी महिलाओं को बहुत बाद में अधिकार मिला। अमेरिकी संविधान के 19वें संशोधन (19th Amendment) के जरिए वर्ष 1920 में महिलाओं को वोटिंग का अधिकार मिला।
- ब्रिटेन (1928): ब्रिटेन में ‘इक्वल फ्रेंचाइजी एक्ट’ (Equal Franchise Act) के तहत 21 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को पुरुषों के समान मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ।
भारत में महिलाओं के वोटिंग अधिकार का इतिहास (Indian History)
भारत का इतिहास इस मामले में दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं अधिक प्रगतिशील रहा है।
- ब्रिटिश काल में शुरुआत (1921): भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1921 में मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में पहली बार महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला था। हालांकि, यह अधिकार ‘सीमित’ था और केवल उन्हीं महिलाओं को मिलता था जो बहुत धनी थीं या उच्च शिक्षित थीं।
आजादी और पूर्ण समानता (1950): अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में महिलाओं को वोट के अधिकार के लिए दशकों तक लड़ना पड़ा। लेकिन भारत ने अपनी आजादी के पहले दिन से ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा किया। 26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ, तो देश की हर वयस्क महिला को बिना किसी जाति, धर्म या आर्थिक भेदभाव के ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ (Universal Adult Suffrage) के तहत वोट देने का पूर्ण अधिकार दे दिया गया
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